
विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर देशभर में आदिवासी समुदायों ने अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का उत्साहपूर्वक जश्न मनाया। लेकिन इस उत्सव के बीच, उनके अधिकार, पहचान और अस्तित्व से जुड़े गंभीर मुद्दों पर भी गहन चर्चा हुई। हालिया सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, पिछले चार वर्षों में 78,135 हेक्टेयर से अधिक वन भूमि को गैर-वन उद्देश्यों के लिए हस्तांतरित किया गया है। यह स्थिति आदिवासी समुदायों की पारंपरिक जीवनशैली और आजीविका के लिए बड़ा खतरा है।
वन और आदिवासी: जीवन का आधार
आदिवासी समाज का जीवन वनों और प्रकृति से गहराई से जुड़ा हुआ है। वन न केवल आजीविका का प्रमुख स्रोत हैं, बल्कि उनकी संस्कृति, आध्यात्मिकता और पहचान का भी अभिन्न हिस्सा हैं। बड़े पैमाने पर हो रहे वन भूमि डायवर्जन ने इस संबंध को कमजोर किया है और उनके कानूनी अधिकारों को भी चुनौती दी है।
छत्तीसगढ़ की स्थिति
आंकड़ों के अनुसार, मध्य प्रदेश, ओडिशा और अरुणाचल प्रदेश में सबसे अधिक वन भूमि डायवर्जन हुआ है। छत्तीसगढ़ भी इससे अछूता नहीं है, जहां 4,092.01 हेक्टेयर वन भूमि का हस्तांतरण हुआ है।
इस गंभीर स्थिति पर जनपद पंचायत दुर्ग के सदस्य और किसान नेता ढालेश साहू ने कहा —
“विकास के नाम पर वन भूमि का यह विनाशकारी हस्तांतरण आदिवासी और ग्रामीण समुदायों की आजीविका पर सीधा हमला है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में, जहां वन हमारी संस्कृति और अर्थव्यवस्था का आधार हैं, यह आंकड़े बेहद चिंताजनक हैं।”
उन्होंने आगे कहा —
“वन अधिकार कानून, 2006 हमें अपनी भूमि पर अधिकार प्रदान करता है, लेकिन इसका सही कार्यान्वयन आज भी बड़ी चुनौती है। विश्व आदिवासी दिवस हमें न केवल अपनी विरासत का सम्मान करने, बल्कि अपने अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा देता है।”
संघर्ष का संदेश
विश्व आदिवासी दिवस यह याद दिलाता है कि विकास की राह में आदिवासी समुदाय की आवाज़ को दबाया नहीं जा सकता। उनका संघर्ष केवल अपनी भूमि के लिए नहीं, बल्कि संस्कृति, पहचान और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के लिए है।







