
दुर्ग जिले के जिला पंचायत मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ) बजरंग कुमार दुबे की ओर से 12 फरवरी 2026 को जिला पंचायत सभागार में आयोजित बैठक ने कर्मचारियों में भारी असंतोष पैदा कर दिया।
बैठक में धमधा जनपद के सचिव, रोजगार सहायक, तकनीकी सहायक समेत 160 से अधिक कर्मचारियों को जिला मुख्यालय बुलाया गया। एजेंडा मनरेगा निर्माण कार्य, समर्थ पोर्टल, संपदा पोर्टल, प्रधानमंत्री आवास योजना, स्वच्छ भारत मिशन आदि की समीक्षा था।
धमधा जनपद के कर्मचारियों ने बैठक से निकलने के बाद कानाफूसी करते हुए कहा कि बैठक जनपद स्तर पर ही हो सकती थी, यहां बुलाने का क्या मतलब हुआ। तभी हमारे संवाददाता ने बात किया तब नाम नहीं छापने की शर्त पर रोजगार सहायक एवं अन्य कर्मचारियों ने बताया कि इस बैठक में प्रत्येक कर्मचारी औसतन 300 रुपये से अधिक का पेट्रोल/डीजल खर्च कर आया है, कुल मिलाकर 50,000 रुपये से ज्यादा का अनावश्यक ईंधन व्यय हुआ। कर्मचारियों का साफ कहना है कि सीईओ श्री बजरंग दुबे अपनी टीम लेकर धमधा जनपद आ जाते तो मात्र 1,000 रुपये के डीजल में काम चल जाता।

कर्मचारी पहले से आर्थिक संकट में हैं, वेतन में देरी या तंगी की शिकायतें आम हैं, ऐसे में जिला स्तर पर बुलाकर व्यक्तिगत खर्च करवाना क्रूरता के समान है। पंचायती राज अधिनियम और मनरेगा गाइडलाइंस में विकेंद्रीकरण पर जोर है—जनपद/ग्राम स्तर पर समीक्षा संभव और प्राथमिकता होनी चाहिए। जिला स्तर की बैठकें जरूरी हैं, लेकिन जब इतना बड़ा व्यय और असुविधा हो, जबकि वर्चुअल मीटिंग या स्थानीय आयोजन आसान विकल्प हैं, तो यह प्रशासनिक अहंकार और कर्मचारी-विरोधी रवैया नहीं तो क्या है ??वैसे बड़े अधिकारियों को इन फिल्ड वर्क के कर्मचारियों को कोल्हू का बैल समझना बंद करना चाहिए।
यह पहला मामला नहीं है जहां श्री बजरंग दुबे के फैसलों पर सवाल उठे हैं। पहले भी बिना जीएसटी के चाय नास्ता का हज़ारों रुपए के बिल हो या गढ़कलेवा टेंडर हो या अन्य मामले… खैर यह बैठक कर्मचारियों के लिए आर्थिक बोझ ही नहीं बन गई, बल्कि विकास योजनाओं की समीक्षा के नाम पर उनकी मेहनत और जेब दोनों लूटी गई।