दुर्ग। जिले में जनगणना का काम अब पूरी तरह ‘ईको-फ्रेंडली’ और ‘अति-प्राचीन’ पद्धति की ओर लौट आया है। सरकार ने प्रगणकों के हाथों में चमचमाते आधुनिक मार्कर थमाए थे ताकि वे घरों पर नंबर लिख सकें, लेकिन इन मार्करों की सांसें जनगणना शुरू होते ही फूल गईं। बताया जा रहा है कि मार्कर की स्याही उतनी ही जल्दी सूख गई, जितनी जल्दी चुनावी वादे सूखते हैं।अब जब ‘हाई-टेक’ मार्कर जवाब दे गए, तो प्रशासन ने अपनी जड़ों की ओर लौटने का फैसला किया है। अब प्रगणक महोदय कंधे पर झोला लटकाए, एक हाथ में लाल गेरू की बाल्टी और दूसरे में कूची (ब्रश) लिए घर-घर दस्तक देंगे।
इस ‘अनोखे’ बदलाव के कुछ मुख्य पहलू:
1. बजट की बचत या कला का प्रदर्शन: मार्कर की स्याही के लिए टेंडर का झंझट खत्म। अब मिट्टी और पानी के संगम से ‘आत्मनिर्भर’ जनगणना होगी।
2. स्थायित्व की गारंटी: प्रगणकों का मानना है कि सरकारी मार्कर भले धोखा दे जाए, लेकिन गेरू का निशान सालों-साल बना रहता है। जब तक अगली जनगणना आएगी, तब तक पिछली वाली का नंबर दीवार पर चमकता रहेगा।
3. प्रगणक अब कलाकार: अब गणना के साथ-साथ दीवारों पर कलाकारी का मुफ्त लाभ भी गृहस्वामियों को मिलेगा। डिजिटल इंडिया के दौर में ‘वॉल पेंटिंग’ का यह देसी तड़का चर्चा का विषय बना हुआ है।
4. धूप का असर: धूप इतनी तेज है कि मार्कर की स्याही तो उड़ी ही, प्रगणकों का पसीना देखकर अब डर है कि कहीं दीवारों पर लगा गेरू भी न बह जाए। विपक्ष और आम जनता का कहना है कि यह ‘स्मार्ट सिटी’ की दिशा में एक ‘कलात्मक’ कदम है। जहाँ पूरी दुनिया डेटा क्लाउड में सेव कर रही है, दुर्ग जिला उसे गेरू से दीवारों पर ‘हार्ड कॉपी’ के रूप में सहेज रहा है।अधिकारियों का कहना है कि काम नहीं रुकना चाहिए, चाहे मार्कर चले या न चले। आखिर मिट्टी का कर्ज मिट्टी से ही तो चुकाया जाएगा!








