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Series 1: क्या ग्राम पंचायतों में ठेका प्रथा ने छीना स्थानीय स्वशासन का अधिकार?

 

पंचायती राज अधिनियम की भावना के विपरीत पंचायत प्रतिनिधियों पर बढ़ रहा दबाव, सरपंचों का दावा- कार्य एजेंसियां थोपे जाने की कोशिश।

Durg। 73वें संविधान संशोधन के तहत ग्राम पंचायतों को स्थानीय स्वशासन की इकाई बनाया गया था ताकि गांव के विकास कार्यों का निर्णय ग्राम सभा और निर्वाचित पंचायत प्रतिनिधि कर सकें। लेकिन जिले की कई ग्राम पंचायतों से ऐसी शिकायतें सामने आ रही हैं कि विकास कार्यों के लिए बाहरी ठेकेदारों और एजेंसियों को प्राथमिकता देने का दबाव बनाया जा रहा है। सरपंचों का कहना है कि कार्य स्वीकृति से लेकर भुगतान तक विभिन्न स्तरों पर हस्तक्षेप होने से पंचायतों की स्वायत्तता प्रभावित हो रही है।पंचायत प्रतिनिधियों का आरोप है कि कार्य एजेंसी चुनने की स्वतंत्रता सीमित होती जा रही है। विभागीय तालमेल के नाम पर अक्सर सरपंचों को कुछ खास फर्मों या ठेकेदारों के साथ काम करने के लिए मजबूर किया जाता है। यदि सरपंच विरोध करते हैं, तो फाइलों को तकनीकी स्वीकृति और प्रशासनिक मंजूरी के जाल में उलझा दिया जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि पंचायती राज अधिनियम का उद्देश्य स्थानीय भागीदारी और जवाबदेही बढ़ाना था, न कि पंचायतों को केवल भुगतान एजेंसी बनाना।जल्द ही ‘उबाल’ मारेगा।

ग्राम पंचायतों में स्थानीय स्वशासन के बजाय विधायक बंगले से ठेकेदार और सामग्री की आपूर्ति थोपे जाने का भारी दबाव है, जिससे पंचायत प्रतिनिधियों की निर्णय लेने की स्वतंत्रता समाप्त हो रही है। सरपंचों के अनुसार, यह हस्तक्षेप ‘आदेश’ की तरह काम कर रहा है, और यह ‘विधायक-ठेकेदार नेक्सस’ अब ग्राम सभाओं की स्वायत्तता को कमजोर कर रहा है। सरपंच संघ इस बढ़ते दबाव के खिलाफ लामबंद हो रहा है और जल्द ही कलेक्टर से मामले की जांच की मांग कर सकता है।

असंतोष: कलेक्टर की भूमिका पर नजर

चौंकाने वाली बात यह है कि वर्तमान में इस गंभीर विषय पर आधिकारिक तौर पर कोई लिखित शिकायत दर्ज नहीं कराई गई है। इसका मुख्य कारण पंचायत प्रतिनिधियों के मन में व्याप्त यह डर है कि सीधे विरोध करने पर उनके गांव के विकास फंड को रोका जा सकता है। लेकिन यह ‘मौन’ शांति का संकेत नहीं है; सरपंचों के बीच अंदर ही अंदर सुलगता यह असंतोष अब जल्द ही उबाल मारने की उम्मीद है।सरपंच संघ के सूत्रों का कहना है कि यदि जल्द ही इस अदृश्य दबाव को कम नहीं किया गया, तो वे सामूहिक रूप से कलेक्टर के पास दस्तक देंगे। उम्मीद जताई जा रही है कि मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए कलेक्टर स्वयं इसका संज्ञान ले सकते हैं। यदि कलेक्टर इन आरोपों की जांच कराते हैं, तो विकास कार्यों में ‘कमीशन’ के लिए कार्य एजेंसियां थोपने वाले सिंडिकेट का भंडाफोड़ हो सकता है। फिलहाल, पंचायत प्रतिनिधि लामबंद हो रहे हैं और जल्द ही एक बड़ा आंदोलन जिला मुख्यालय पर देखने को मिल सकता है।

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Author: Dhaara News

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