रायपुर। 16वें वित्त आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद ग्राम पंचायतों, जनपद पंचायतों और जिला पंचायतों में वर्षों से कार्यरत कंप्यूटर ऑपरेटर एवं डाटा एंट्री ऑपरेटरों के भविष्य को लेकर चर्चा तेज हो गई है। पंचायतों के डिजिटलीकरण, ऑनलाइन भुगतान, ई-ग्राम स्वराज, पीएम आवास, मनरेगा, जन्म-मृत्यु पंजीयन और विभिन्न पोर्टलों के संचालन में इन कर्मचारियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है, लेकिन अब उनके मानदेय के स्रोत को लेकर असमंजस की स्थिति बनती दिखाई दे रही है।
16वें वित्त आयोग ने ग्रामीण स्थानीय निकायों के लिए अनुदान राशि में वृद्धि की है तथा अनुदान को बेसिक और परफॉर्मेंस ग्रांट में विभाजित किया है। आयोग ने पंचायतों में वित्तीय अनुशासन, लेखा प्रकाशन और जवाबदेही पर विशेष जोर दिया है।
कर्मचारियों की चिंता
पंचायतों में कार्यरत ऑपरेटरों का कहना है कि यदि वित्त आयोग की राशि से स्थापना व्यय अथवा मानदेय भुगतान पर रोक या सीमित उपयोग की व्यवस्था लागू होती है तो हजारों कर्मचारियों की नौकरी संकट में पड़ सकती है। कई पंचायतों में सचिवों से अधिक डिजिटल कार्य इन्हीं ऑपरेटरों के भरोसे संचालित हो रहे हैं।
कर्मचारियों का तर्क है कि जब शासन लगातार ऑनलाइन कार्य बढ़ा रहा है तो डिजिटल व्यवस्था संभालने वाले मानव संसाधन के लिए भी स्थायी नीति बनानी चाहिए। केवल कंप्यूटर और इंटरनेट उपलब्ध करा देने से व्यवस्था नहीं चल सकती।
सरकार और अधिकारियों का पक्ष
दूसरी ओर पंचायत प्रशासन से जुड़े अधिकारी मानते हैं कि वित्त आयोग का मुख्य उद्देश्य विकास कार्य, स्वच्छता, जल प्रबंधन और पंचायतों की संस्थागत क्षमता बढ़ाना है। पूर्व वित्त आयोगों के दिशा-निर्देशों में भी अनुदान राशि को वेतन और स्थापना व्यय में खर्च करने पर प्रतिबंध या सीमित अनुमति की व्यवस्था रही है।
अधिकारियों का कहना है कि यदि राज्य सरकार चाहे तो अलग मद से कंप्यूटर ऑपरेटरों के लिए व्यवस्था कर सकती है, इसलिए कर्मचारियों को घबराने के बजाय शासन के स्पष्ट निर्देशों की प्रतीक्षा करनी चाहिए।
विपक्ष और कर्मचारी संगठनों के सवाल
कर्मचारी संगठनों का आरोप है कि पंचायतों को पूरी तरह ऑनलाइन बना दिया गया है, लेकिन डिजिटल व्यवस्था संभालने वाले ऑपरेटरों के लिए न तो नियमित सेवा नीति है और न ही भविष्य सुरक्षित करने की कोई स्पष्ट योजना। उनका कहना है कि पंचायतों में करोड़ों रुपये के कार्यों का लेखा-जोखा, ऑनलाइन भुगतान और रिपोर्टिंग इन्हीं कर्मचारियों के माध्यम से होती है।
बड़ा सवाल
यदि पंचायतों में कार्यरत कंप्यूटर ऑपरेटरों को हटाया जाता है या उनके मानदेय का स्रोत बंद होता है तो क्या सचिव और अन्य कर्मचारी अतिरिक्त डिजिटल कार्यों का भार संभाल पाएंगे? वहीं यदि इन्हें बनाए रखना है तो राज्य सरकार इनके लिए अलग वित्तीय प्रावधान करेगी या नहीं, यह आने वाले समय में बड़ा मुद्दा बन सकता है
फिलहाल पंचायतों में एक ही चर्चा है—”डिजिटल पंचायत तो चाहिए, लेकिन उसे चलाने वाले ऑपरेटरों का भविष्य कौन सुरक्षित करेगा?”








