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सीरीज-2 : “विकास का पैसा या कमीशन का खेल?”*पंचायतों में घटिया निर्माण पर उठ रहे सवाल, आखिर जिम्मेदार कौन?

 

ग्राम पंचायतों में इन दिनों एक सवाल तेजी से गूंज रहा है—क्या विकास कार्यों की गुणवत्ता जानबूझकर कमजोर की जा रही है और यदि हां, तो इसके पीछे कौन लोग हैं?

पंचायत प्रतिनिधियों और ग्रामीणों के बीच यह चर्चा आम है कि कई मामलों में भुगतान प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही संबंधित सचिवों तक फोन पहुंच जाते हैं। आरोप लगाए जा रहे हैं कि विकास कार्यों के चयन से लेकर भुगतान तक अनौपचारिक हस्तक्षेप लगातार बढ़ रहा है।

कुछ पंचायत प्रतिनिधियों का दावा है कि कई बार पंचायत सचिवों को फोन के माध्यम से विशेष एजेंसियों या ठेकेदारों के पक्ष में निर्देश दिए जाते हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र जांच और आधिकारिक पुष्टि अभी होना बाकी है, लेकिन पंचायतों में इस प्रकार की चर्चाएं लगातार बढ़ रही हैं।

सबसे बड़ा असर विकास कार्यों की गुणवत्ता पर दिखाई दे रहा है।

ग्रामीणों का आरोप है कि कई गांवों में बने सामुदायिक भवनों, सीसी रोड, नाली निर्माण और अन्य विकास कार्यों की गुणवत्ता बेहद कमजोर है। कुछ निर्माण कार्य ऐसे हैं जो पूरा होने के कुछ ही महीनों में दरारों, टूट-फूट और खराब सामग्री के कारण सवालों के घेरे में आ गए हैं।

विडंबना यह है कि गांव की जनता सीधे सरपंच को जिम्मेदार मानती है।

ग्रामीणों के बीच सरपंच को भ्रष्टाचारी कहा जा रहा है, जबकि कई सरपंच निजी बातचीत में दावा कर रहे हैं कि कार्यों के चयन और क्रियान्वयन में उनकी भूमिका सीमित कर दी गई है। उनका कहना है कि बाहर से आने वाले ठेकेदार पंचायत स्तर पर औपचारिक सहमति लेकर कार्य करते हैं और बाद में निर्माण की गुणवत्ता को लेकर पूरा ठीकरा पंचायत प्रतिनिधियों पर फूटता है।

कई पंचायत प्रतिनिधियों का आरोप है कि कुछ ठेकेदार मामूली लाभ या कमीशन देकर पंचायत स्तर पर सहमति प्राप्त कर लेते हैं और उसके बाद निर्माण कार्यों में गुणवत्ता से समझौता किया जाता है।

ग्रामीणों का कहना है कि पिछले कई वर्षों में विकास कार्यों की गुणवत्ता को लेकर जितनी शिकायतें वर्तमान कार्यकाल में सामने आ रही हैं, उतनी पहले कभी देखने को नहीं मिलीं। यह दावा कितना सही है, इसका मूल्यांकन तकनीकी जांच और विभागीय परीक्षण से ही संभव है, लेकिन गांवों में नाराजगी लगातार बढ़ रही है।

सबसे गंभीर आरोप यह है कि यदि कोई सरपंच या पंचायत प्रतिनिधि इस व्यवस्था का विरोध करता है, तो उस पर विभिन्न प्रकार के दबाव बनने लगते हैं। दूसरी ओर, ग्रामीणों का मानना है कि शिकायत करने के बाद भी कोई प्रभावी कार्रवाईh नहीं होती क्योंकि “ऊपर तक सेटिंग” होने की चर्चा आम हो चुकी है।

यही कारण है कि अब सवाल केवल घटिया निर्माण का नहीं रह गया है।

सवाल यह है कि यदि पंचायतों के प्रशासनिक और वित्तीय निर्णय वास्तव में बाहरी प्रभाव में लिए जा रहे हैं, तो क्या पंचायती राज अधिनियम की मूल भावना सुरक्षित है?

क्या ग्राम सभा सर्वोच्च है?

क्या पंचायतें स्वतंत्र हैं?

क्या विकास कार्यों की गुणवत्ता की जवाबदेही तय होगी?

और सबसे बड़ा सवाल—

यदि गांव का पैसा गांव के विकास पर पूरा खर्च हो रहा है, तो फिर जनता को गुणवत्ता दिखाई क्यों नहीं दे रही?

ग्रामीणों और पंचायत प्रतिनिधियों का आरोप है कि जब भी किसी गांव में घटिया निर्माण कार्य, कमजोर गुणवत्ता वाली सीसी रोड, नाली या सामुदायिक भवन को लेकर सवाल उठाए जाते हैं, तब शिकायतकर्ताओं को ही “विकास विरोधी” बताकर चुप कराने की कोशिश की जाती है। गांवों में यह धारणा बनती जा रही है कि निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल उठाना मानो किसी बड़े हित को चुनौती देना हो। कई स्थानों पर शिकायत करने वाले ग्रामीणों को यह कहकर हतोत्साहित किया जाता है कि उनके विरोध के कारण गांव का विकास रुक जाएगा। परिणाम यह है कि लोग खराब निर्माण देखकर भी खुलकर शिकायत करने से बचने लगे हैं।

सबसे चिंताजनक स्थिति तब पैदा होती है जब गुणवत्ता को लेकर उठी शिकायतों की निष्पक्ष जांच के बजाय शिकायतकर्ता की नीयत पर ही सवाल खड़े किए जाने लगते हैं। यदि कोई सरपंच, पंच या ग्रामीण निर्माण कार्यों में उपयोग हुई सामग्री, प्राक्कलन या भुगतान की जानकारी मांगता है तो उसे “विरोधी”, “राजनीति करने वाला” या “विकास रोकने वाला” बताने की कोशिश की जाती है। इससे पारदर्शिता की मांग करने वाले लोगों का मनोबल टूटता है और जवाबदेही की पूरी व्यवस्था कमजोर पड़ती है।

आज गांवों में सवाल केवल घटिया निर्माण का नहीं है। सवाल यह है कि क्या विकास के नाम पर जनता को चुप कराया जा रहा है? क्या गुणवत्ता पर सवाल उठाना अब अपराध बनता जा रहा है? और यदि शिकायतकर्ता ही कटघरे में खड़ा कर दिया जाएगा, तो फिर पंचायतों में पारदर्शिता और जवाबदेही की उम्मीद कौन करेगा?

पंचायती राज व्यवस्था की आत्मा ग्राम सभा है। यदि ग्राम सभा की आवाज को “विकास विरोधी” कहकर दबाया जाने लगे, तो यह केवल एक पंचायत का नहीं बल्कि पूरे स्थानीय स्वशासन तंत्र का संकट है।

(अगली कड़ी में: “फोन, दबाव और एजेंसी बदलने का खेल — आखिर पंचायतों में निर्णय कौन ले रहा है?”)

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Author: Dhaara News

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