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डाक सेवा हुई महंगी! 2014 के मुकाबले कई गुना बढ़ा खर्च, रजिस्ट्री सेवा भी हुई बंद – क्या आम आदमी पर बढ़ा बोझ?

 

नई दिल्ली। कभी आम नागरिक के लिए सबसे सस्ती और भरोसेमंद मानी जाने वाली डाक सेवा अब पहले की तुलना में काफी महंगी महसूस होने लगी है। पिछले एक दशक में डाक विभाग ने कई चरणों में शुल्कों में संशोधन किया है। वहीं, सितंबर 2025 से भारत सरकार ने पारंपरिक रजिस्टर्ड पोस्ट (Registered Post) सेवा को बंद कर उसे स्पीड पोस्ट में समाहित कर दिया। इसका उद्देश्य सेवाओं का आधुनिकीकरण और बेहतर ट्रैकिंग बताया गया।

2014 बनाम आज

2014 के आसपास एक साधारण रजिस्ट्री कराने का कुल खर्च सामान्यतः ₹20–30 के बीच पड़ता था (डाक शुल्क और पंजीकरण शुल्क सहित), जबकि आज उसी प्रकार के दस्तावेज़ को स्पीड पोस्ट से भेजने पर दूरी और वजन के अनुसार लगभग ₹47 से ₹60 या उससे अधिक का खर्च आना सामान्य बात है। स्थानीय स्पीड पोस्ट की शुरुआती दर लगभग ₹19 है, जबकि अन्य शहरों के लिए 50 ग्राम तक की डाक का आधार शुल्क लगभग ₹47 (GST अतिरिक्त) है।

सरकार का तर्क

सरकार और डाक विभाग का कहना है कि:

– स्पीड पोस्ट से तेज़ डिलीवरी मिलती है।

– ऑनलाइन ट्रैकिंग अधिक प्रभावी है।

– सेवाओं का डिजिटलीकरण और एकीकरण किया गया है।

– पुराने सिस्टम के रखरखाव की लागत कम होगी।

आम जनता की परेशानी

हालांकि, आम नागरिकों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि:

– न्यायालय, सरकारी कार्यालय और कानूनी नोटिस भेजना पहले की तुलना में महंगा हो गया।

– गरीब, किसान, विद्यार्थी और ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ा।

– छोटे-छोटे दस्तावेज़ भेजने की लागत लगभग दोगुनी जैसी महसूस होती है।

क्या डाक विभाग घाटे में है?

भारतीय डाक विभाग केवल व्यावसायिक संस्था नहीं है, बल्कि एक सार्वजनिक सेवा नेटवर्क भी है। देश के दूर-दराज़ क्षेत्रों तक डाक, बैंकिंग, आधार, बचत योजनाएँ और सरकारी सेवाएँ पहुँचाने के कारण इसकी संचालन लागत बहुत अधिक रहती है। इसी कारण सरकार समय-समय पर शुल्कों में संशोधन और सेवाओं के आधुनिकीकरण की नीति अपनाती रही है।

रोजगार का बड़ा माध्यम

भारतीय डाक विभाग देश के सबसे बड़े सरकारी नेटवर्कों में से एक है। लाखों कर्मचारी, ग्रामीण डाक सेवक (GDS), पोस्टमैन और अन्य कार्मिक इसके माध्यम से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में यह आज भी बैंकिंग, पेंशन और सरकारी योजनाओं की महत्वपूर्ण कड़ी बना हुआ है।

बड़ा सवाल

डाक सेवाओं के आधुनिकीकरण और तेज़ डिलीवरी का स्वागत किया जा सकता है, लेकिन सवाल यह भी उठता है कि क्या बढ़ती शुल्क दरों के बीच आम नागरिक को कोई सस्ती वैकल्पिक सेवा उपलब्ध कराई जानी चाहिए? विशेषकर कानूनी दस्तावेज़, सरकारी आवेदन और ग्रामीण उपभोक्ताओं के लिए कम लागत वाली डाक सेवा की मांग लगातार उठती रही है।

अब बहस इस बात पर है कि डिजिटल सुधारों का लाभ जनता तक पहुँचा या फिर बढ़ी हुई डाक दरों ने आम लोगों की जेब पर अतिरिक्त बोझ डाल दिया।

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Author: Dhaara News

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