नई दिल्ली। वर्ष 2014 से वर्ष 2026 के बीच भारत में डेयरी उत्पादों की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है। दूध, दही, पनीर, घी और मक्खन जैसे रोजमर्रा के खाद्य पदार्थ, जो लगभग हर भारतीय परिवार की रसोई का हिस्सा हैं, आज पहले की तुलना में काफी महंगे हो चुके हैं। पिछले 12 वर्षों में इन उत्पादों की कीमतों में औसतन 80 से 100 प्रतिशत तक की वृद्धि ने घरेलू बजट पर सीधा असर डाला है।
बाजार के औसत खुदरा मूल्य के अनुसार वर्ष 2014 में एक लीटर दूध की कीमत लगभग 38 रुपये थी, जो वर्ष 2026 में बढ़कर 60 से 72 रुपये के बीच पहुंच गई है। इसी प्रकार 400 से 500 ग्राम दही, जो 2014 में लगभग 32 रुपये में उपलब्ध था, अब 58 से 62 रुपये तक बिक रहा है। एक किलोग्राम पनीर की कीमत 260 रुपये से बढ़कर लगभग 480 रुपये हो गई है, जबकि एक लीटर घी की कीमत 360 रुपये से बढ़कर 700 रुपये से अधिक हो चुकी है। मक्खन के दाम भी लगभग 80 प्रतिशत तक बढ़ गए हैं।
प्रमुख डेयरी ब्रांडों की वर्तमान स्थिति
देश की अग्रणी डेयरी कंपनियों Amul, Mother Dairy, Nandini, Verka, Saras, Heritage और Aavin ने पिछले कुछ वर्षों में कई बार अपने उत्पादों के दाम बढ़ाए हैं। वर्तमान में फुल क्रीम और स्टैंडर्ड दूध की कीमत अधिकांश बड़े ब्रांडों में लगभग 68 से 74 रुपये प्रति लीटर के बीच है, जबकि क्षेत्रीय ब्रांडों में यह कीमत कुछ कम या अधिक हो सकती है।
विशेष रूप से मई 2026 में अमूल और मदर डेयरी ने दूध के दाम में 2 रुपये प्रति लीटर की वृद्धि की थी। कंपनियों का कहना था कि किसानों को अधिक भुगतान, पशु चारे की बढ़ती कीमत, परिवहन व्यय, पैकेजिंग सामग्री और ऊर्जा लागत में वृद्धि के कारण कीमतें बढ़ाना आवश्यक हो गया था
आखिर इतनी महंगाई क्यों?
विशेषज्ञों के अनुसार डेयरी उत्पादों की कीमतों में वृद्धि के पीछे कई आर्थिक कारण हैं—
पशुओं के चारे की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी।
डीजल और परिवहन लागत में वृद्धि।
बिजली एवं कोल्ड स्टोरेज संचालन का बढ़ता खर्च।
प्लास्टिक पैकेजिंग सामग्री महंगी होना।
दुग्ध उत्पादकों को अधिक खरीद मूल्य देना।
प्रोसेसिंग, गुणवत्ता परीक्षण और वितरण लागत बढ़ना।
कुछ वर्षों में कम वर्षा और गर्मी के कारण दूध उत्पादन पर असर पड़ना।
आम परिवारों पर क्या असर?
डेयरी उत्पादों की लगातार बढ़ती कीमतों का सबसे अधिक प्रभाव मध्यमवर्गीय और निम्न आय वर्ग के परिवारों पर पड़ा है। जिन घरों में प्रतिदिन 2 से 3 लीटर दूध की खपत होती है, वहां केवल दूध पर होने वाला मासिक खर्च 2014 की तुलना में लगभग दोगुना हो चुका है। दही, घी और पनीर जैसे उत्पाद अब कई परिवारों के लिए नियमित उपयोग के बजाय अवसर विशेष तक सीमित होने लगे हैं।
किसानों को कितना लाभ?
हालांकि कीमतों में वृद्धि का एक सकारात्मक पक्ष यह भी है कि कई राज्यों में दुग्ध उत्पादकों को पहले की तुलना में अधिक खरीद मूल्य मिल रहा है। इससे डेयरी किसानों की आय में कुछ सुधार हुआ है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि खुदरा मूल्य में हुई पूरी बढ़ोतरी का लाभ किसानों तक नहीं पहुंचता। इसका एक बड़ा हिस्सा प्रोसेसिंग, पैकेजिंग, परिवहन और विपणन लागत में चला जाता है।
आगे क्या?
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि पशु आहार, ईंधन और परिवहन लागत में कमी नहीं आती तथा दूध उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि नहीं होती, तो आने वाले वर्षों में डेयरी उत्पादों की कीमतों में और बढ़ोतरी की संभावना बनी रह सकती है। दूसरी ओर, सरकार और डेयरी सहकारी संस्थाएं उत्पादन बढ़ाने, पशुपालकों को प्रोत्साहन देने और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने के प्रयास कर रही हैं ताकि उपभोक्ताओं पर महंगाई का बोझ कम किया जा सके।
निष्कर्ष
पिछले 12 वर्षों में डेयरी उत्पादों की कीमतों में आई तेज वृद्धि यह संकेत देती है कि खाद्य महंगाई का प्रभाव केवल रसोई तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आम परिवारों की बचत, पोषण और जीवनशैली पर भी सीधा असर डाल रहा है। आने वाले समय में कीमतों को नियंत्रित रखना सरकार, डेयरी उद्योग और नीति निर्माताओं के लिए एक बड़ी चुनौती होगी।








