दुर्ग ग्रामीण।चुनाव की आहट तेज है और जनता अपने जनप्रतिनिधियों से विकास और मूलभूत सुविधाओं की उम्मीद लगाए बैठी है। लेकिन रिसाली नगर निगम से जुड़ी एक खबर ने व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। करीब 30 लाख रुपये की लागत से तैयार किया गया ‘स्वर्ग रथ’ दो महीने बाद भी जनता के काम नहीं आ सका है।
समाचार पत्र नई दुनिया में प्रकाशित खबर के मुताबिक, वाहन को लेकर विवाद और प्रक्रियात्मक पेच के चलते यह वाहन अब तक निगम को वापस नहीं मिल पाया है। यानी जिस व्यवस्था का उद्देश्य जरूरत के समय आम लोगों को राहत देना था, वह खुद ‘वापसी की राह’ देख रही है।
व्यवस्था भगवान भरोसे, तो ‘स्वर्ग रथ’ की क्या जरूरत?
मामला सामने आने के बाद क्षेत्र में लोग तरह-तरह के सवाल पूछ रहे हैं। आखिर 30 लाख रुपये खर्च करने के बाद भी जब जनता को समय पर सुविधा नहीं मिल रही, तो इस पूरी व्यवस्था का फायदा किसे मिल रहा है?
हालात पर तंज कसते हुए कहा जा सकता है—
“जब निगम का भगवान ही मालिक हो, तो स्वर्ग रथ का क्या करना? भगवान सबकी व्यवस्था खुद कर लेंगे!”
लेकिन यह व्यंग्य जितना मजेदार लगता है, हकीकत उतनी ही गंभीर है। जिस वाहन को जरूरतमंद परिवारों के लिए उपलब्ध होना चाहिए, वह कागजी प्रक्रिया और विवादों के बीच अटका हुआ है।
चुनाव से पहले बड़ा सवाल
चुनाव नजदीक हैं। ऐसे समय में जनता सिर्फ घोषणाएं नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाली सुविधाओं का हिसाब भी मांग सकती है। 30 लाख रुपये की लागत वाला वाहन अगर दो महीने बाद भी उपयोग में नहीं आया, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिम्मेदारी किसकी है और जनता को जवाब कौन देगा?
क्या निगम के अधिकारियों ने वाहन तैयार होने के बाद उसकी समय पर सुपुर्दगी और संचालन सुनिश्चित करने की कोशिश की?
क्या विवाद को समय रहते सुलझाया जा सकता था?
और सबसे बड़ा सवाल—जब जनता के पैसे से व्यवस्था खड़ी की गई है, तो जनता को उसका लाभ कब मिलेगा?
‘ स्वर्ग रथ’ खड़ा है, सवाल दौड़ रहे हैं
विडंबना देखिए—नाम है ‘स्वर्ग रथ’, लेकिन जनता के लिए इसकी सुविधा अभी तक धरती पर उपलब्ध नहीं हो पाई। वाहन खड़ा है, विवाद चल रहा है और जनता इंतजार कर रही है।
अब देखना होगा कि चुनावी मौसम में निगम इस ‘स्वर्ग रथ’ को जनता की सेवा के लिए सड़क पर उतारता है या फिर यह भी सरकारी फाइलों और प्रक्रियाओं में ही ‘स्वर्गवास’ कर जाता है।
जनता के पैसों से खरीदा गया वाहन जनता के काम कब आएगा—यही अब सबसे बड़ा सवाल है।







