एल्डरमैन का इंतजार खत्म, अब टिकट की बारी! आरक्षण ने रिसाली भाजपा की पूरी बिसात पलट दी
रिसाली। जिस एल्डरमैन पद की उम्मीद में रिसाली भाजपा के सैकड़ों कार्यकर्ता ढाई साल से इंतजार में बैठे थे, आरक्षण की घोषणा के साथ ही उनकी उम्मीदों पर निगम चुनाव तक ब्रेक लग गया है।
सूत्रों का दावा है कि भाजपा सरकार बनने के बाद से एल्डरमैन की दौड़ में करीब 350 कार्यकर्ताओं के नाम अलग-अलग स्तर पर चर्चा में थे, जबकि कई वार्डों में 5 से 7 तक दावेदारों की सूची तैयार होने की बात सामने आ रही थी।
अब आरक्षण ने इनमें से कई दावेदारों के सामने ऐसी स्थिति खड़ी कर दी है कि एल्डरमैन तो दूर, अपने ही वार्ड से पार्षद बनने का रास्ता भी आसान नहीं रहा।
यही वजह है कि रिसाली भाजपा में चुनावी सरगर्मी से ज्यादा अब दावेदारों को संभालने और नाराजगी रोकने की चुनौती चर्चा में है।
एक पद की उम्मीद, दो रास्ते बंद?
भाजपा की सरकार बनने के बाद रिसाली में एल्डरमैन नियुक्ति को लेकर लंबे समय से कार्यकर्ताओं के बीच उम्मीद बनी हुई थी। आसपास के कुछ नगरीय निकायों में नियुक्तियां होने के बाद यहां भी दावेदारों को उम्मीद थी कि कभी न कभी उनकी बारी आएगी।
इसी उम्मीद में कई कार्यकर्ता संगठन के लिए सक्रिय रहे और अपने नाम को संभावित सूची में बनाए रखने की कोशिश करते रहे।
लेकिन अब वार्ड आरक्षण ने पूरी गणित बदल दी है।
जिन नेताओं को उम्मीद थी कि एल्डरमैन के रास्ते से नगर निगम की राजनीति में प्रवेश मिलेगा, उनमें से कुछ अब अपने वार्ड से पार्षद का चुनाव लड़ने की स्थिति में भी नहीं रह गए हैं।
दूसरे वार्ड का रास्ता भी फूलों की सेज नहीं
अपने वार्ड में आरक्षण अनुकूल नहीं आया तो दूसरे वार्ड से चुनाव लड़ने का विकल्प जरूर है, लेकिन वहां पहले से मौजूद दावेदारों के सामने यह कदम नया विवाद खड़ा कर सकता है।
क्योंकि हर वार्ड में सिर्फ एक टिकट है और दावेदार कई।
ऐसे में बाहर से आने वाले चेहरे को टिकट मिलने पर स्थानीय कार्यकर्ता क्या रुख अपनाएंगे, यह भाजपा संगठन के लिए बड़ा सवाल होगा।
परिवार के किसी सदस्य या करीबी को मैदान में उतारने का विकल्प भी है, लेकिन रबर स्टैंप के तौर पर किसी को खड़ा कर देना और खुद पार्षद बनना—राजनीतिक रूप से दोनों बातें बिल्कुल अलग हैं।
खुशी भी संभलकर मनानी पड़ रही!
आरक्षण के बाद जिन वर्तमान पार्षदों और दावेदारों के लिए समीकरण अनुकूल दिखाई दे रहे हैं, उनकी मुश्किल भी कम नहीं है।
कहा जा रहा है कि वार्ड में आरक्षण अनुकूल आने की खुशी ज्यादा जाहिर की तो दूसरे दावेदार नाराज हो सकते हैं। लिहाजा कई दावेदार खुश होकर भी खामोश रहने की स्थिति में दिखाई दे रहे हैं।
यानी रिसाली की राजनीति में फिलहाल एक अजीब स्थिति है—
जिसका वार्ड बच गया, वह टिकट को लेकर चिंतित है और जिसका वार्ड आरक्षण की जद में चला गया, वह अब अगले राजनीतिक ठिकाने की तलाश में है।
भाजपा के सामने अब असली परीक्षा
रिसाली में भाजपा के लिए चुनाव केवल कांग्रेस के खिलाफ मुकाबला नहीं होगा। उससे पहले संगठन को अपने ही दावेदारों के बीच संतुलन बनाना होगा।
कौन टिकट मांगेगा, किसे टिकट मिलेगा, किसे समझाया जाएगा और कौन समझाने के बावजूद नहीं मानेगा—इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में संगठन की रणनीति तय करेंगे।
कांग्रेस में भी आरक्षण के चलते कई पुराने चेहरों के समीकरण बदले हैं। इसलिए दोनों दलों में टिकट वितरण के बाद असली तस्वीर सामने आएगी।
ढाई साल का इंतजार अब सवाल बनकर सामने
सबसे बड़ा सवाल उन कार्यकर्ताओं का है जो लंबे समय से नामांकित पार्षद बनने की उम्मीद लगाए बैठे थे।
अगर एल्डरमैन की नियुक्ति नहीं होती और आरक्षण के कारण पार्षद बनने का रास्ता भी बंद हो जाता है, तो इन कार्यकर्ताओं की राजनीतिक नाराजगी को संगठन किस तरह संभालेगा?
रिसाली भाजपा के लिए यही इस चुनाव की सबसे बड़ी चुनौती बन सकती है।
क्योंकि चुनाव सिर्फ प्रत्याशी चुनने का नहीं होगा—
किसे टिकट देकर खुश करना है, किसे समझाना है और किसकी नाराजगी को भीतरघात बनने से रोकना है, असली परीक्षा अब यहीं से शुरू होगी।
आरक्षण की तस्वीर साफ हो चुकी है।
अब टिकट की बारी है—और रिसाली में असली सिर फुटव्वल शायद यहीं से शुरू होगी।






