अपने छोटे-छोटे कामों के लिए भटक रहे कार्यकर्ता, विरोधियों के काम मिनटों में होने की चर्चा; विधायक निवास में बढ़ती नाराजगी ने खड़े किए सवाल
Chhattisgarh। जिले के एक भाजपा विधायक के क्षेत्र में इन दिनों पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच नाराजगी की चर्चाएं तेज हैं। कार्यकर्ताओं की मानें तो चुनाव के दौरान दिन-रात पार्टी के लिए मेहनत करने वालों के छोटे-छोटे प्रशासनिक, न्यायालयीन और पंजीयन संबंधी काम तक आसानी से नहीं हो पा रहे हैं। दूसरी ओर, जिन लोगों को कभी पार्टी का विरोधी माना जाता था, उनके काम तेजी से होने की चर्चा ने कार्यकर्ताओं की बेचैनी और बढ़ा दी है।
कार्यकर्ताओं के बीच सबसे ज्यादा चर्चा विधायक के निजी सहायक (PA) को लेकर है। कुछ कार्यकर्ताओं का आरोप है कि उनके काम महीनों से लंबित हैं और हर बार उन्हें एक ही जवाब मिलता है—“थोड़ा समय दीजिए, काम हो जाएगा।” लेकिन तारीख पर तारीख मिलते-मिलते अब कार्यकर्ताओं के सब्र का बांध टूटने लगा है।
‘हमारे काम में अड़ंगा, दूसरों के काम में रफ्तार’!
कार्यकर्ताओं के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि आखिर विधायक के आसपास ऐसा कौन-सा सिस्टम बन गया है, जिसमें पार्टी के अपने लोगों को छोटे-छोटे कामों के लिए भी फजीहत झेलनी पड़ रही है, जबकि विरोधी खेमे से जुड़े लोगों के काम कथित तौर पर तेजी से हो रहे हैं।
हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन क्षेत्र में इस तरह की चर्चाएं लगातार होने की बात कही जा रही है।
PA पर विरोधियों से पैसे लेने के आरोप, सवालों के घेरे में विधायक निवास
कुछ कार्यकर्ताओं द्वारा PA पर काम कराने के नाम पर कथित तौर पर विरोधियों से पैसे लेकर काम करने और विधायक जी का नाम लेकर फोन लगाने के आरोप भी लगाए जा रहे हैं। सवाल यह है कि यदि ये आरोप निराधार हैं तो विधायक निवास की ओर से इन चर्चाओं पर स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं की जा रही?
कार्यकर्ताओं में व्यंग्यात्मक चर्चा है—“विधायक जी के पास जमीन-जायदाद की कमी नहीं, फिर विधायक निवास में किसकी जेब भरने का खेल चल रहा है?”
यह केवल कार्यकर्ताओं की कही-सुनी बात है; पैसे लेने के आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
तीन साल होने को आए, अब भी ‘थोड़ा सब्र रखिए’
विधायक का कार्यकाल आगे बढ़ रहा है, लेकिन कई पुराने कार्यकर्ताओं का कहना है कि उन्हें अभी भी अपने काम के लिए आश्वासन ही मिल रहा है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि चुनाव के समय उनसे निस्वार्थ भाव से काम लिया गया, लेकिन अब जब उन्हें जरूरत है तो छोटे-छोटे कामों के लिए भी दर-दर भटकना पड़ रहा है।
कुछ नाराज कार्यकर्ताओं के इस्तीफा देने की चर्चा भी है। हालांकि चुनावी समय नजदीक आने के कारण वे खुलकर कदम उठाने से बच रहे हैं।
‘जिनके खिलाफ लड़कर आए, उन्हीं के काम पहले?’*
सबसे बड़ा सवाल उन चर्चाओं से उठ रहा है जिनमें दावा किया जा रहा है कि विधायक के PA के माध्यम से कांग्रेस शासनकाल में काम कर चुके कुछ ठेकेदारों और पुराने संपर्कों को भी अब काम मिल रहा है।
भाजपा के जमीनी कार्यकर्ताओं में इसे लेकर नाराजगी बताई जा रही है। उनका सवाल है कि “जब चुनाव हम लड़ें, बूथ हम संभालें, झंडा हम उठाएं और जरूरत पड़ने पर थाने-कचहरी तक हम दौड़ें, तो काम के समय हमारी बारी क्यों नहीं आती?”
विधायक जमीन पर बैठते हैं, लेकिन कार्यकर्ता दिखाई नहीं देते?
विधायक के कामकाज को लेकर भी कुछ कार्यकर्ता अब खुलकर सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि विधायक जनता और कार्यकर्ताओं के बीच जमीन पर बैठते तो हैं, लेकिन शायद उन्हें वह “जमीनी कार्यकर्ता” दिखाई नहीं दे रहा, जिसने चुनाव के समय उनके लिए अपना समय और पैसा लगाया था।
व्यंग्य यह भी किया जा रहा है कि निजी सहायक का काम विधायक को सही सलाह देना होता है, लेकिन यदि सलाह ही गलत दिशा में जा रही हो तो फिर विधायक निवास से निकलने वाले फैसलों का असर जमीन पर कैसे दिखाई देगा?
‘कार्यकर्ता नहीं, ठेकेदार संभालेंगे अगला चुनाव?’
सबसे चुभता हुआ सवाल अब यही है—क्या अगला चुनाव जमीनी कार्यकर्ताओं के भरोसे लड़ा जाएगा या ठेकेदारों और प्रभावशाली लोगों के भरोसे?
कुछ कार्यकर्ताओं का कहना है कि विधायक निवास से उन्होंने दूरी बनानी शुरू कर दी है। उनका तर्क है कि जब वहां जाने के बाद भी काम नहीं होना है तो बार-बार चक्कर लगाने का फायदा क्या?
एक नाराज कार्यकर्ता ने व्यंग्य में कहा—
“पहले पार्टी के लिए मुफ्त में सेवा की, अब अगर काम कराने के लिए भी खर्चा और कमीशन लगेगा तो घर से बाहर निकलने का भी हिसाब रखेंगे।”
सवाल विधायक से ज्यादा सिस्टम पर
पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल केवल PA की कार्यशैली का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का है जो विधायक के नाम पर चल रही है। यदि कार्यकर्ताओं के आरोप गलत हैं तो विधायक को खुलकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। और यदि कहीं काम के बदले पैसे मांगने जैसी शिकायतें सही पाई जाती हैं तो कार्रवाई भी होनी चाहिए।
क्योंकि जनता ने विधायक को जनता और कार्यकर्ताओं की समस्याएं सुनने के लिए चुना है, ‘डेट पर डेट’ देने के लिए नहीं।
अब देखना यह है कि विधायक अपने ही कार्यकर्ताओं की नाराजगी सुनते हैं या फिर विधायक निवास में लगी ‘डेट मशीन’ अगले चुनाव तक चलती रहती है।








