दुर्ग/भिलाई। साइबर ठगी के बढ़ते नेटवर्क के बीच दुर्ग पुलिस की कार्रवाई में एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने धार्मिक-सामाजिक पहचान और साइबर अपराध के बीच कथित कनेक्शन को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। पुलिस की कार्रवाई में ओम रवि भारती समेत 14 म्यूल बैंक खाताधारकों के खिलाफ वैधानिक कार्रवाई की गई है। रवि भारती को उपलब्ध स्थानीय रिपोर्टों में छत्तीसगढ़ बजरंग दल का दुर्ग जिला अध्यक्ष बताया गया है।
पुलिस जांच के मुताबिक इन बैंक खातों का इस्तेमाल साइबर ठगी से जुड़ी रकम के लेन-देन के लिए किया जा रहा था। जांच में खातों में करोड़ों रुपये के संदिग्ध लेन-देन सामने आने की बात कही गई है। पुलिस के अनुसार, आरोपियों ने कमीशन के लालच में अपने बैंक खाते, पासबुक, एटीएम कार्ड, चेकबुक और सिम कार्ड दूसरे लोगों को उपलब्ध कराए थे।

महज 2 से 15 हजार के कमीशन के लिए बैंकिंग किट सौंपने का आरोप
जांच में सामने आया कि कथित तौर पर ₹2,000 से ₹15,000 तक के कमीशन के लालच में बैंकिंग संसाधन उपलब्ध कराए गए। यही खाते साइबर अपराधियों के लिए ठगी की रकम को एक खाते से दूसरे खाते में पहुंचाने का माध्यम बने। ऐसे खातों को साइबर अपराध की भाषा में ‘म्यूल अकाउंट’ कहा जाता है।
पुलिस कार्रवाई के दौरान संबंधित आरोपियों से बैंकिंग दस्तावेज, पासबुक, एटीएम कार्ड, चेकबुक, सिम कार्ड, मोबाइल फोन सहित अन्य सामग्री जब्त किए जाने की जानकारी सामने आई है।
धर्म और संगठन की पहचान पर भी उठे सवाल
मामले का सबसे चर्चित पहलू यह है कि कार्रवाई में शामिल बताए जा रहे ओम रवि भारती धार्मिक संगठन बजरंग दल के दुर्ग जिला अध्यक्ष के रूप में सार्वजनिक रूप से सक्रिय रहे हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या धार्मिक पहचान और संगठन में पद की सामाजिक विश्वसनीयता का इस्तेमाल कथित साइबर नेटवर्क में लोगों को प्रभावित करने या भरोसा हासिल करने के लिए किया गया?
हालांकि, इस संबंध में पुलिस की ओर से यह स्पष्ट किया जाना अभी बाकी है कि संगठन के पद अथवा धार्मिक पहचान का ठगी की किसी विशेष घटना में किस प्रकार और किस स्तर पर कथित इस्तेमाल हुआ। इसलिए इसे जांच का विषय माना जाना चाहिए, न कि अभी अंतिम तथ्य।
14 खातों पर पुलिस की कार्रवाई
उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार दुर्ग पुलिस ने नेवई और छावनी थाना क्षेत्रों में कुल 14 म्यूल बैंक खाताधारकों के खिलाफ कार्रवाई की है। इनमें छावनी थाना क्षेत्र से रवि भारती सहित तीन लोगों के नाम सामने आए हैं।
पुलिस का कहना है कि बैंक खातों और मोबाइल नंबरों के तकनीकी विश्लेषण तथा संदिग्ध लेन-देन की जांच के आधार पर संबंधित खाताधारकों की पहचान की गई।
संगठन के अन्य कार्यकर्ताओं के खातों की भी जांच जरूरी
मामले की गंभीरता को देखते हुए यह जांच करना भी आवश्यक है कि कहीं संगठन से जुड़े अन्य कार्यकर्ताओं या पदाधिकारियों के बैंक खातों में भी साइबर ठगी से जुड़ी रकम तो नहीं आई। दुर्ग पुलिस को इस दिशा में भी विस्तृत जांच करनी चाहिए और संदिग्ध लेन-देन, खातों तथा संबंधित मोबाइल नंबरों का तकनीकी विश्लेषण करना चाहिए। यदि किसी अन्य कार्यकर्ता के खाते में ऐसी रकम आने की पुष्टि होती है, तो उसकी भूमिका और जानकारी के आधार पर कानूनी कार्रवाई तय की जानी चाहिए।
अब जांच का असली सवाल—पैसा कहां से आया और कहां गया?
म्यूल खातों के मामले में केवल खाता उपलब्ध कराने वाले व्यक्तियों तक जांच सीमित नहीं रहती। सबसे महत्वपूर्ण कड़ी यह होती है कि ठगी की रकम किस खाते से आई, किन खातों में गई और इसके पीछे वास्तविक साइबर ठगी का मास्टरमाइंड कौन है।
अब पुलिस की आगे की जांच में इन खातों से जुड़े लेन-देन, मोबाइल नंबरों, डिजिटल साक्ष्यों और उन लोगों की भूमिका सामने आना महत्वपूर्ण होगा, जिन्होंने कथित तौर पर इन बैंकिंग संसाधनों का इस्तेमाल किया।








