2000 ईंट को 6000 बनाने वाले सुपरवाइजर का जलवा बरकरार, सीमेंट का हिसाब कौन देगा? जांच और जवाबदेही पर उठ रहे सवाल
दुर्ग। दुर्ग ग्रामीण विधानसभा क्षेत्र के एक ग्राम पंचायत में निर्माण कार्य के लिए मंगाई गई करीब 100 बोरी सीमेंट के अचानक गायब होने की चर्चा इन दिनों जोर पकड़ रही है। मामला नाली निर्माण का है, सीसी रोड का है या फिर किसी भवन निर्माण का, इसकी आधिकारिक पुष्टि फिलहाल सामने नहीं आई है। लेकिन सीमेंट की इतनी बड़ी मात्रा का हिसाब अचानक चर्चा का विषय बन जाना कई सवाल खड़े कर रहा है।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि फिलहाल इस मामले में किसी प्रकार की प्राथमिक सूचना रिपोर्ट दर्ज होने की जानकारी भी सामने नहीं आई है। ऐसे में इसे चोरी कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन 100 बोरी सीमेंट आखिर कहां गई, यह सवाल अपनी जगह कायम है।
100 बोरी सीमेंट गायब या हिसाब-किताब में कोई खेल?
निर्माण कार्य के लिए सीमेंट दुकान से वास्तव में पूरी मात्रा में निकली भी थी या नहीं? यदि निकली थी तो उसे किसने प्राप्त किया? मौके पर कितनी बोरी पहुंची और उसका उपयोग कहां हुआ? कहीं पूरा हिसाब-किताब पहले से ही तय तो नहीं था? ऐसे कई सवाल अब चर्चा में हैं।
यह भी सवाल है कि सीमेंट अचानक गायब हुई या फिर इसके पीछे पहले से कोई ऐसी व्यवस्था तैयार थी, जिसका हिसाब अब ढूंढा जा रहा है। हालांकि इन आशंकाओं की पुष्टि जांच और दस्तावेजों के परीक्षण के बाद ही हो सकेगी।
2000 ईंट से 6000 ईंट बनाने वाले सुपरवाइजर का कमाल!
इस पूरे मामले में सबसे दिलचस्प किरदार उस सुपरवाइजर का बताया जा रहा है, जिसे निर्माण कार्य की निगरानी के लिए जिम्मेदारी दी गई थी। चर्चा है कि निगरानी की जिम्मेदारी तो मिली, लेकिन काम की निगरानी किस स्तर पर हुई, यह अपने आप में जांच का विषय है।
स्थानीय स्तर पर व्यंग्य के अंदाज में यह भी चर्चा है कि जिस सुपरवाइजर ने 2000 ईंट को 6000 ईंट बनाने जैसा कमाल दिखाया हो, उसके लिए 100 बोरी सीमेंट का हिसाब निकालना आखिर कौन-सी बड़ी बात होगी!
हैरानी यह भी है कि निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठने के बावजूद संबंधित सुपरवाइजर का प्रभाव कम होने के बजाय लगातार बढ़ता नजर आने की चर्चा है।
इंजीनियर के कार्यालय में बड़ी कुर्सी और गुणवत्ता का मूल्यांकन!
निर्माण कार्यों की गुणवत्ता को लेकर पहले भी अलग-अलग जगहों से शिकायतें सामने आती रही हैं। ऐसे में यदि निर्माण सामग्री का हिसाब ही संदिग्ध हो जाए तो तैयार होने वाले निर्माण की मजबूती पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
व्यंग्य तो यह भी है कि मौके पर निर्माण कार्य की वास्तविक स्थिति कुछ भी हो, लेकिन इंजीनियर के कार्यालय में पहुंचकर बड़ी कुर्सी पर बैठकर गुणवत्ता का मूल्यांकन करवाने का हुनर भी कम महत्वपूर्ण नहीं है।
यदि निर्माण सामग्री की खपत, ईंटों की संख्या और सीमेंट के उपयोग का वास्तविक सत्यापन किया जाए तो कई अनसुलझे सवालों के जवाब मिल सकते हैं।
ठेकेदार को काम से मतलब या सामग्री के हिसाब से भी?
इस पूरे घटनाक्रम में ठेकेदार की भूमिका और जिम्मेदारी भी स्पष्ट होनी चाहिए। आखिर निर्माण सामग्री किसके सुपुर्द की गई थी? उसका स्टॉक रजिस्टर कहां है? सामग्री प्राप्ति की रसीद किसके पास है? कार्यस्थल पर कितनी सामग्री इस्तेमाल हुई और कितनी शेष बची?
सुपरवाइजर, इंजीनियर और संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी तय किए बिना 100 बोरी सीमेंट का रहस्य सुलझना मुश्किल है।
अब सवाल दुर्ग ग्रामीण विधानसभा से…
दुर्ग ग्रामीण विधानसभा की संबंधित ग्राम पंचायत में 100 बोरी सीमेंट के गायब होने की चर्चा ने निर्माण कार्यों की निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
अब देखना यह है कि संबंधित ग्राम पंचायत, जनपद पंचायत और तकनीकी विभाग इस मामले में सामग्री का वास्तविक हिसाब सामने लाते हैं या फिर यह मामला भी फाइलों और आपसी जिम्मेदारी के खेल में उलझकर रह जाता है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि 100 बोरी सीमेंट कहां गई? दुकान से निकली तो किसने ली, मौके पर पहुंची तो किसने संभाली और यदि इस्तेमाल हुई तो किस निर्माण में लगी?
फिलहाल सीमेंट का हिसाब गायब है, सवालों की संख्या बढ़ रही है और सुपरवाइजर की कार्यशैली चर्चा में है। जांच हुई तो शायद सीमेंट का पूरा गणित सामने आ जाए।








