क्या अब पति-पत्नी अलग-अलग प्रधानमंत्री आवास में रहेंगे?
विशेष व्यंग्यात्मक रिपोर्ट ।प्रधानमंत्री आवास योजना का उद्देश्य था कि वर्ष 2022 तक हर गरीब परिवार को पक्का मकान मिल जाए। लेकिन वर्ष 2026 आते-आते कई गांवों में योजना का ऐसा स्वरूप सामने आ रहा है कि गरीबों से ज्यादा “कागजी पात्रों” की चिंता होती दिखाई दे रही है।
प्रधानमंत्री आवास योजना 2.0 के लिए ग्राम सभाओं में जिस तेजी से सूची पारित की गई, उसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। पंचायतों ने विवाद से बचने का सबसे आसान रास्ता चुना—जो नाम आया, उसे ऊपर भेज दो। आखिर पैसा शासन का है, किसी जनप्रतिनिधि या अधिकारी की जेब से तो जाना नहीं है।
स्थिति यह है कि कई जगहों पर जिन परिवारों को पहले ही आवास का लाभ मिल चुका है, उन्हीं परिवारों के दूसरे सदस्यों के नाम भी नई सूची में दिखाई दे रहे हैं। कहीं पति के नाम से पहले आवास स्वीकृत हुआ था, अब पत्नी के नाम से भी आवास सूची में नाम दर्ज है। गांव के लोग मजाक में पूछ रहे हैं कि क्या अब पति-पत्नी अलग-अलग प्रधानमंत्री आवास में रहेंगे?
इतना ही नहीं, कई ऐसे लोगों के नाम सूची में पाए गए हैं जिनके पक्के मकान वर्षों पहले बन चुके हैं। कुछ लोगों के पास जमीन तक नहीं है, फिर भी सूची में उनका नाम है। वहीं कई वास्तविक जरूरतमंद परिवार, जो आज भी कच्चे या आधे कच्चे-आधे पक्के मकानों में जीवन गुजार रहे हैं, सूची से बाहर बताए जा रहे हैं।
प्रशासन का तर्क है कि “नाम सूची में होने से कुछ नहीं होता, भौतिक सत्यापन में अपात्रों के नाम हट जाएंगे।” लेकिन सवाल यह है कि यदि सत्यापन में ही सब तय होना है तो फिर गलत नामों को सूची में शामिल करने की जरूरत क्यों पड़ी?
ग्रामीणों का कहना है कि सर्वे प्रक्रिया में भी कई खामियां रहीं। कहीं दूसरे के कच्चे मकान की तस्वीर अपलोड कर पात्रता हासिल करने की कोशिश हुई, तो कहीं एक ही परिवार के कई सदस्यों के नाम सामने आ गए। ऐसे मामलों ने पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
ग्राम सभाओं में सूची बिना विशेष आपत्ति के पारित जरूर हो गई, लेकिन लोगों के मन में कई आपत्तियां अब भी जीवित हैं। सबसे बड़ा सवाल उन गरीब परिवारों का है जिनका नाम सूची में नहीं आया। उन्हें डर है कि कहीं पात्र होने के बावजूद वे फिर से सरकारी फाइलों के जंगल में न भटक जाएं।
प्रधानमंत्री आवास योजना का सपना “हर गरीब को घर” था, लेकिन कई गांवों में चर्चा इस बात की है कि आखिर घर किसे मिलेगा—वास्तविक जरूरतमंद को या फिर उस व्यक्ति को जिसका नाम किसी तरह सूची में दर्ज हो गया?
फिलहाल ग्रामीणों के बीच एक ही व्यंग्य चल रहा है—
“पहले पति को आवास मिला, अब पत्नी को भी सूची में जगह मिल गई। अगर दोनों को स्वीकृति मिल गई तो शायद सरकार को परिवार नियोजन की जगह आवास नियोजन की नई योजना भी बनानी पड़ेगी।”








