घटिया निर्माण, कथित ठेकेदारी व्यवस्था, पंचायतों पर दबाव और धारा 40 के डर जैसे मुद्दों पर पहली बार एकजुट हुए सरपंच।
दुर्ग। विशेष रिपोर्ट कई दिनों से पंचायतों में कथित ठेकेदारी व्यवस्था, विकास कार्यों की खराब गुणवत्ता, पंचायतों में बाहरी हस्तक्षेप और सरपंचों पर बढ़ते दबाव को लेकर प्रकाशित हो रही dhaaranews.com की खोजी श्रृंखला का असर अब ज़मीन पर दिखाई देने लगा है।
दुर्ग जिले में पहली बार विभिन्न जनपद पंचायतों के सरपंच एक मंच पर एकत्रित हुए और पंचायतों से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर खुलकर चर्चा की। बैठक में ग्राम पंचायतों के सामने आ रही प्रशासनिक, वित्तीय और विकास कार्यों से जुड़ी समस्याओं पर गंभीर मंथन किया गया।
बैठक में शामिल सरपंचों ने निर्णय लिया कि पंचायतों की समस्याओं को लेकर जिला कलेक्टर को 10 सूत्रीय मांगों का ज्ञापन सौंपा जाएगा। बताया जा रहा है कि ज्ञापन में पंचायतों की स्वायत्तता, एजेंसी चयन, निर्माण कार्यों की गुणवत्ता, ग्राम सभा की भूमिका, सचिवों पर दबाव तथा पंचायत प्रतिनिधियों के अधिकारों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाया जाएगा।
बैठक में कई सरपंचों ने यह भी कहा कि यदि पंचायतों को संविधान और पंचायती राज व्यवस्था के अनुरूप स्वतंत्र रूप से कार्य करने का अवसर नहीं मिलेगा तो ग्रामीण विकास की मूल भावना प्रभावित होगी।
चर्चा के दौरान यह मुद्दा भी सामने आया कि विकास कार्यों की गुणवत्ता पर सवाल उठाने वाले सरपंचों और ग्रामीणों को कई बार “विकास विरोधी” कहकर उनकी आवाज़ दबाने का प्रयास किया जाता है। सरपंचों का कहना है कि पंचायतों में पारदर्शिता और गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए शिकायतों का निष्पक्ष परीक्षण होना चाहिए, न कि शिकायतकर्ताओं को ही कटघरे में खड़ा किया जाए।
बैठक में ग्राम पंचायतों में बाहरी ठेकेदारी व्यवस्था, कथित दबाव, निर्माण कार्यों की गुणवत्ता तथा पंचायत प्रतिनिधियों की भूमिका पर भी व्यापक चर्चा हुई। कई सरपंचों ने मांग की कि पंचायतों को उनके वैधानिक अधिकारों के अनुरूप कार्य करने दिया जाए और ग्राम सभा के निर्णयों का सम्मान सुनिश्चित किया जाए।
राजनीतिक गलियारों में इस बैठक को महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है। लंबे समय से अलग-अलग आवाज़ उठा रहे सरपंच अब पहली बार संगठित होकर अपनी समस्याओं को प्रशासन के समक्ष रखने जा रहे हैं। इससे पंचायत व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर व्यापक बहस तेज होने की संभावना है।
अब सबकी निगाहें जिला प्रशासन पर हैं। यदि कलेक्टर के समक्ष रखी जाने वाली 10 सूत्रीय मांगों पर सकारात्मक पहल होती है तो पंचायत प्रतिनिधियों को राहत मिल सकती है और ग्रामीण विकास कार्यों में पारदर्शिता तथा गुणवत्ता सुनिश्चित करने की दिशा में नए कदम उठाए जा सकते हैं।
बड़ा सवाल
क्या यह बैठक पंचायतों में बदलाव की शुरुआत साबित होगी?
क्या सरपंचों की आवाज़ सुनी जाएगी?
क्या ग्राम पंचायतों को वास्तव में संविधान और पंचायती राज अधिनियम के अनुरूप स्वतंत्र रूप से कार्य करने का अवसर मिलेगा?
इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में सामने आएंगे।








