@गुलाब। देश में आंदोलनों का इतिहास जितना पुराना है, उतना ही पुराना है उनके मूल्यांकन का तरीका। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले आंदोलन को उसके उद्देश्य से परखा जाता था, अब अक्सर आंदोलनकारी के नाम, मंच और राजनीतिक सुविधा से परखा जाने लगा है।
याद कीजिए वर्ष 2025 का वह दौर, जब लद्दाख के पर्यावरण, स्थानीय अधिकारों, राज्य के दर्जे और संविधान की छठी अनुसूची की मांग को लेकर सोनम वांगचुक आंदोलन कर रहे थे। आंदोलन ने जोर पकड़ा, तनाव बढ़ा, हिंसा भी हुई और उसके बाद सरकार ने 26 सितंबर 2025 को उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) लगाकर हिरासत में ले लिया। सरकार का कहना था कि सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित हुई है, जबकि वांगचुक लगातार कहते रहे कि उनका आंदोलन शांतिपूर्ण था। लगभग छह महीने बाद सरकार ने स्वयं उनकी NSA हिरासत वापस ले ली और वे रिहा हो गए।
लेकिन उस समय सबसे बड़ा सवाल यह नहीं बना कि लद्दाख के लोग आखिर मांग क्या रहे थे। चर्चा अधिक इस बात पर हुई कि कानून-व्यवस्था बिगड़ी, सुरक्षा का खतरा पैदा हुआ और कठोर कार्रवाई क्यों आवश्यक थी। जिन लोगों को आज लोकतांत्रिक विरोध सबसे बड़ा अधिकार दिखाई देता है, उनमें से अनेक उस समय उतनी मुखरता से नजर नहीं आए।
अब समय बदल गया है।
आज जब शिक्षा व्यवस्था, कथित पेपर लीक और युवाओं के भविष्य जैसे मुद्दों पर फिर सोनम वांगचुक चर्चा में हैं, तो बहस का केंद्र बदल गया है। अब कुछ लोग उस मंच पर सवाल उठा रहे हैं, जहाँ वे खड़े हैं। कहा जा रहा है कि मंच गलत है, लोग गलत हैं, इसलिए आंदोलन भी संदिग्ध है।
यहीं लोकतंत्र का सबसे बड़ा दुर्भाग्य छिपा है।
क्या मंच किसी व्यक्ति के खड़े होने से गलत हो जाता है?
अगर कल सोनम वांगचुक को “राष्ट्रीय सुरक्षा” के चश्मे से देखा गया, तो आज उन्हें “लोकतंत्र के प्रहरी” के रूप में क्यों देखा जा रहा है? और यदि आज उनका संघर्ष सही माना जा रहा है, तो क्या यह स्वीकार नहीं करना चाहिए कि विरोध करने का अधिकार व्यक्ति की राजनीतिक सुविधा से बड़ा होता है?
लोकतंत्र में असली परीक्षा तब होती है, जब हम उस व्यक्ति के अधिकार की भी रक्षा करें जिससे हम सहमत नहीं हैं। लेकिन हमारे यहाँ अक्सर इसका उल्टा होता है। यदि आंदोलन हमारे विचारों से मेल खाता है तो वह “जनआंदोलन” बन जाता है, और यदि नहीं खाता तो वही आंदोलन “गलत मंच”, “प्रायोजित अभियान” या “व्यवस्था विरोधी साजिश” कह दिया जाता है।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि मंच वही रहता है, सड़क वही रहती है, संविधान वही रहता है और विरोध का अधिकार भी वही रहता है। बदलता है तो केवल नैरेटिव।
कल यदि किसी आंदोलनकारी पर NSA लगती है तो कुछ लोग उसे व्यवस्था की मजबूरी बताते हैं। आज वही लोग किसी दूसरे मंच पर लोकतंत्र बचाने का संदेश देते हैं। दूसरी ओर, जो लोग आज मंच को गलत बता रहे हैं, उनसे भी यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि यदि उसी मंच पर आपका पसंदीदा चेहरा खड़ा होता, तब भी क्या मंच गलत ही कहलाता?
शायद यही हमारे समय की सबसे बड़ी विडंबना है। अब मुद्दे नहीं, चेहरे तय करते हैं कि ताली बजेगी या ट्रोलिंग होगी। मंच नहीं बदलता, सिद्धांत नहीं बदलते, संविधान नहीं बदलता—बदलता है तो केवल नैरेटिव।
और जब नैरेटिव ही सच से बड़ा हो जाए, तब लोकतंत्र में सबसे ज्यादा नुकसान किसी सरकार या विपक्ष का नहीं, बल्कि जनता की विवेकशीलता का होता है।








