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रिसाली में ‘स्वर्ग’ की राह भी बदहाल! अंतिम संस्कार के लिए परिवार ने खुद खोदा गड्ढा, बारिश में भीगती लकड़ियां और व्यवस्था पर गंभीर सवाल

 

रिसाली मुक्तिधाम में कर्मचारियों का टोटा, रखरखाव के नाम पर ठेका लेकिन सुविधाएं नदारद; स्वर्ग रथ के बाद अब मुक्तिधाम की बदहाली पर उठे सवाल 

रिसाली। किसी परिवार के लिए अपने प्रियजन को अंतिम विदाई देना जीवन के सबसे कठिन क्षणों में से एक होता है। लेकिन रिसाली नगर निगम के वार्ड क्रमांक 24 में एक परिवार को इस दुखद घड़ी में भी नगर निगम की कथित बदहाल व्यवस्था का सामना करना पड़ा। अंतिम संस्कार के लिए परिवार को खुद ही गड्ढा खोदने की व्यवस्था करनी पड़ी। बारिश के बीच परिवार के सदस्यों ने गड्ढा तैयार किया और फिर शव का अंतिम संस्कार किया।

मामला यहीं खत्म नहीं होता। मुक्तिधाम में अंतिम संस्कार के लिए रखी गई लकड़ियां खुले में पड़ी हैं और बरसात के मौसम में उनके रखरखाव की कोई समुचित व्यवस्था नजर नहीं आई। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब अंतिम संस्कार जैसी मूलभूत सुविधा के लिए भी परिवार को खुद व्यवस्था करनी पड़े तो नगर निगम की जिम्मेदारी आखिर किसके लिए है?

ठेका किसे मिला, सुविधा कहां गई ?

पड़ताल के दौरान सामने आया कि मुक्तिधाम का संचालन/रखरखाव किसी ठेकेदार को सौंपे जाने की बात कही जा रही है। इसके बावजूद मौके पर मूलभूत सुविधाओं की स्थिति संतोषजनक नहीं दिखी।

वार्ड 24 के पार्षद एवं लोक निर्माण विभाग के प्रभारी जहीर अब्बास, जो निगम की एमआईसी के सदस्य भी हैं, ने बताया कि लगभग एक वर्ष पूर्व ‘मयारू संगवारी ग्रुप’ नामक संस्था ने मुक्तिधाम को नि:शुल्क संचालित एवं रखरखाव करने का प्रस्ताव दिया था। पार्षद के मुताबिक इसके बावजूद व्यवस्था उस संस्था को देने के बजाय ठेके के माध्यम से चलाने का निर्णय लिया गया।

पार्षद ने ठेकेदार को फायदा पहुंचाने के उद्देश्य से व्यवस्था किए जाने का आरोप लगाया है। हालांकि इस संबंध में निगम प्रशासन और संबंधित ठेकेदार का पक्ष सामने आना बाकी है।

कर्मचारी को एकमुश्त ₹9 हजार, न ईएसआई न पीएफ?

मुक्तिधाम की व्यवस्था से जुड़े एक कर्मचारी ने भी अपनी परेशानियां बताईं। कर्मचारी के अनुसार उन्हें ईएसआई और पीएफ जैसी सामाजिक सुरक्षा सुविधाएं नहीं मिलतीं और एकमुश्त करीब ₹9,000 का भुगतान किया जाता है। कर्मचारी का यह भी कहना है कि उन्हें एक दिन की छुट्टी तक नहीं मिलती।

यदि कर्मचारी का दावा सही है तो यह भी जांच का विषय है कि मुक्तिधाम के रखरखाव के लिए जारी राशि में कर्मचारियों को वास्तव में कितना भुगतान किया जा रहा है और उनके श्रम एवं सामाजिक सुरक्षा से जुड़े नियमों का पालन किस हद तक हो रहा है।

छह महीने पहले टेंडर, सड़क अब तक अधूरी

मुक्तिधाम तक पहुंचने वाली सड़क को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। जानकारी के मुताबिक सड़क निर्माण का टेंडर करीब छह महीने पहले हो चुका है, लेकिन अब तक सड़क का निर्माण पूरा नहीं हो पाया है।

बरसात के मौसम में अंतिम संस्कार के लिए मुक्तिधाम पहुंचने वाले लोगों को यदि सड़क की बदहाल स्थिति का सामना करना पड़े तो यह व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

30 लाख का ‘स्वर्ग रथ’ भी नहीं पहुंचा जनता के काम !

इसी नगर निगम क्षेत्र में स्वर्ग रथ को लेकर सवाल उठे हैं। करीब 30 लाख रुपये की लागत से स्वर्ग रथ की व्यवस्था किए जाने की चर्चा के बावजूद जरूरत के समय जनता को इसका लाभ नहीं मिल पाने की बात सामने आई थी।

अब मुक्तिधाम की स्थिति ने उस पूरे मामले को फिर चर्चा में लाकर यह प्रमाणित कर दिया कि रिसाली नगर निगम भगवान भरोसे ही चल रहा है

स्थानीय स्तर पर यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि स्वर्ग रथ का आकार निर्धारित मानकों से छोटा किए जाने के पीछे कमीशनखोरी की भूमिका रही। हालांकि यह आरोप भी स्वतंत्र जांच का विषय है और निगम प्रशासन का आधिकारिक पक्ष सामने आना आवश्यक है।

एक तरफ स्वर्ग रथ की कहानी, दूसरी तरफ भीगती लकड़ियां

विडंबना देखिए—एक तरफ जनता को अंतिम यात्रा के लिए ‘स्वर्ग रथ’ तक उपलब्ध नहीं हो पा रहा और दूसरी तरफ जिस मुक्तिधाम में अंतिम संस्कार होना है, वहां बारिश से बचाने के लिए लकड़ियों तक की समुचित व्यवस्था नहीं दिखाई दे रही।

ऐसे में सवाल सिर्फ एक परिवार का नहीं है। सवाल उन तमाम परिवारों का है जिन्हें भविष्य में इसी मुक्तिधाम का इस्तेमाल करना पड़ेगा।

आखिर जनता के पैसे का हिसाब कौन देगा?

नगर निगम में टैक्स और विभिन्न मदों से जनता का पैसा खर्च होता है। सड़क, मुक्तिधाम, स्वर्ग रथ और रखरखाव जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए बजट भी निर्धारित होता है।

फिर सवाल यह है कि जब पैसा खर्च हो रहा है तो सुविधा जमीन पर क्यों नहीं दिखाई दे रही?

क्या ठेका देने के बाद निगम की जिम्मेदारी खत्म हो जाती है?

क्या मुक्तिधाम की लकड़ियों के रखरखाव की जिम्मेदारी किसी की नहीं है?

क्या अंतिम संस्कार के लिए गड्ढा खोदना भी परिवार की ही जिम्मेदारी है?

क्या छह महीने पहले टेंडर हुई सड़क के लिए जनता को और कितना इंतजार करना होगा?

और यदि कर्मचारियों को वास्तव में ईएसआई-पीएफ का लाभ नहीं मिल रहा तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है?

महापौर कांग्रेस की, विधायक भाजपा के—फिर जनता किससे पूछे सवाल ?

रिसाली नगर निगम में सत्ता कांग्रेस के हाथों में है, जबकि क्षेत्र का विधायक भाजपा से है। राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप अपनी जगह हैं, लेकिन अंतिम संस्कार जैसी संवेदनशील और मूलभूत व्यवस्था में राजनीति से ऊपर उठकर काम करने की जरूरत है।

 

जनता के बीच अब यह सवाल चर्चा में है कि नगर निगम और जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकता आखिर क्या है?

चुनाव नजदीक हैं। ऐसे में जनता विकास के दावों के साथ-साथ यह भी देख रही है कि मुश्किल समय में उसके साथ कौन खड़ा होता है।

 

जिस शहर में लोगों को जीवन के बाद की अंतिम यात्रा तक के लिए खुद व्यवस्था करनी पड़े, वहां विकास के बड़े-बड़े दावों पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

अब देखना होगा कि रिसाली नगर निगम प्रशासन इस पूरे मामले पर क्या जवाब देता है और क्या मुक्तिधाम की व्यवस्था, कर्मचारियों की स्थिति, सड़क निर्माण तथा स्वर्ग रथ से जुड़े आरोपों की निष्पक्ष जांच कराई जाती है।

 

क्योंकि सवाल सिर्फ एक मुक्तिधाम का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का है जो जनता से टैक्स तो लेती है, लेकिन अंतिम समय में भी जनता को अपने हाल पर छोड़ देती है।

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Author: Dhaara News

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