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गांधी की तस्वीर पर फूल चढ़ाने से ज्यादा जरूरी है—इतिहास पर धूल न चढ़ने देना

 

गांधी की आलोचना कीजिए, लेकिन वायरल अफवाहों से इतिहास मत लिखिए

गांधी जयंती विशेष

गुलाब देशमुख ( संपादकीय)

महात्मा गांधी को लेकर आज सोशल मीडिया पर तरह-तरह की बातें कही जाती हैं। उनकी तस्वीरों के साथ दावे किए जाते हैं, पुराने प्रसंगों को नए संदर्भ में पेश किया जाता है, मीम बनाए जाते हैं और कई बार ऐसी बातें भी वायरल कर दी जाती हैं जिनका कोई विश्वसनीय ऐतिहासिक आधार नहीं होता।

गांधी की आलोचना करने का अधिकार हर नागरिक को है। गांधी के विचारों से असहमति भी हो सकती है। उनके राजनीतिक निर्णयों, सामाजिक विचारों और उनके जीवन के विभिन्न पक्षों पर सवाल भी उठाए जा सकते हैं।

लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी ऐतिहासिक व्यक्ति को समझने के बजाय उसके नाम पर अफवाहें वायरल करना इतिहास के प्रति ईमानदारी है?

और यह सवाल केवल गांधी से जुड़े पोस्ट वायरल करने वालों से नहीं, बल्कि हम सभी से है।

गांधी की तस्वीर वायरल करने से पहले एक बार खुद से भी सवाल कीजिए

जो लोग गांधी के खिलाफ सोशल मीडिया पर पोस्ट, मीम और तस्वीरें वायरल करते हैं, उन्हें एक बार खुद से पूछना चाहिए—

मैं जिस व्यक्ति पर आरोप लगा रहा हूं, उसके बारे में मैंने वास्तव में कितना पढ़ा है?

क्या जिस बात को मैं वायरल कर रहा हूं, उसका कोई प्रमाण है?

क्या मैंने गांधी की किताब पढ़ी है या सिर्फ किसी पोस्ट को देखकर अपना निष्कर्ष बना लिया है?

और सबसे बड़ा सवाल—

जिस व्यक्ति के सार्वजनिक जीवन और देश के लिए किए गए योगदान पर मैं सवाल उठा रहा हूं, मैंने स्वयं इस देश के लिए क्या योगदान दिया है?

यह सवाल किसी की देशभक्ति का प्रमाणपत्र बांटने के लिए नहीं है। किसी नागरिक को देश के लिए महान काम किए बिना भी इतिहास पर सवाल पूछने का अधिकार है।

लेकिन जब कोई व्यक्ति किसी ऐतिहासिक चरित्र के खिलाफ गंभीर आरोप सार्वजनिक रूप से फैलाता है, तो कम से कम उसे अपने दावे की सत्यता की जिम्मेदारी जरूर समझनी चाहिए।

गांधी के खिलाफ असहमति तथ्य के साथ हो सकती है।

अफवाह के साथ नहीं।

गांधी कोई भगवान नहीं थे—वे एक इंसान थे

गांधी को समझने की शुरुआत यहीं से होनी चाहिए।

वे कोई देवता बनकर पैदा नहीं हुए थे। वे एक इंसान थे—अपनी खूबियों, कमजोरियों, गलतियों, प्रयोगों और आत्म-संघर्षों के साथ।

उनकी आलोचना इसलिए नहीं रुकनी चाहिए कि उन्हें ‘महात्मा’ कहा गया।

बल्कि गांधी को पढ़ने पर पता चलता है कि उन्होंने खुद अपने जीवन को आलोचना से बचाने की कोशिश नहीं की।

उनकी आत्मकथा The Story of My Experiments with Truth में उनके जीवन के कई ऐसे प्रसंग हैं जिनमें उन्होंने अपनी कमियों, गलतियों, ईर्ष्या, वैवाहिक जीवन के शुरुआती व्यवहार और आत्म-संघर्षों का खुलकर उल्लेख किया।

अर्थात जिन बातों को आज सोशल मीडिया पर ‘गांधी का छिपा हुआ सच’ बताकर वायरल किया जाता है, उनमें से कई प्रसंग गांधी ने खुद अपनी किताब में लिखे थे।

जिस व्यक्ति ने अपनी कमजोरियों को खुद लिखकर सार्वजनिक कर दिया, उसके जीवन की आलोचना तो की जा सकती है, लेकिन उसकी आत्मस्वीकृतियों को सनसनीखेज अफवाह बनाना इतिहास के साथ न्याय नहीं है।

क्या गांधी अच्छे पति और अच्छे पिता थे?

यह एक कठिन लेकिन जरूरी सवाल है।

गांधी के पारिवारिक जीवन में कई जटिलताएं थीं। कस्तूरबा के साथ उनके शुरुआती वैवाहिक संबंधों में अधिकार और ईर्ष्या के प्रसंग मिलते हैं। बेटे हरिलाल के साथ उनके संबंध भी बेहद जटिल रहे।

इन पहलुओं को छिपाने की जरूरत नहीं है।

गांधी को पूर्ण और दोषरहित मनुष्य बनाकर प्रस्तुत करना भी सही नहीं होगा।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा होता है —

क्या किसी व्यक्ति की निजी कमियां उसके पूरे सार्वजनिक जीवन और ऐतिहासिक योगदान को खत्म कर देती हैं?

यदि यही कसौटी अपनाई जाए तो दुनिया के इतिहास में कितने ही बड़े व्यक्तित्व ऐसे होंगे जिन्हें हम उनके निजी जीवन की हर कमी के कारण पूरी तरह खारिज कर दें।

इतिहास किसी व्यक्ति को उसके पूरे संदर्भ में देखता है।

गांधी ने देश के लिए किया क्या?

यहीं से सोशल मीडिया की बहस को इतिहास की जमीन पर लाने की जरूरत है।

गांधी ने दक्षिण अफ्रीका से लेकर भारत तक सत्याग्रह और अहिंसक प्रतिरोध को राजनीतिक संघर्ष का माध्यम बनाया।

भारत में चंपारण सत्याग्रह, खेड़ा आंदोलन, असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन स्वतंत्रता संघर्ष के महत्वपूर्ण पड़ाव बने।

उनकी भूमिका केवल अंग्रेजों के खिलाफ राजनीतिक आंदोलन तक सीमित नहीं थी। वे छुआछूत के खिलाफ अभियान, ग्राम स्वराज, स्वावलंबन, सामाजिक सद्भाव, स्वच्छता और अहिंसा जैसे विषयों पर भी लगातार काम करते रहे।

यह कहना इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा कि भारत की आजादी केवल गांधी की वजह से मिली।

भारत की स्वतंत्रता असंख्य लोगों के संघर्ष का परिणाम थी।

भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, सुभाष चंद्र बोस, सरदार पटेल, जवाहरलाल नेहरू, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, मौलाना आजाद, डॉ. भीमराव आंबेडकर सहित हजारों ज्ञात-अज्ञात लोगों की भूमिकाएं अपने-अपने संदर्भ में महत्वपूर्ण थीं।

लेकिन इन सबके बीच गांधी की भूमिका को केवल सोशल मीडिया की वायरल तस्वीरों के आधार पर नकार देना भी इतिहास नहीं है।

गांधी की जगह कोई दूसरा क्यों नहीं?

यह सवाल पूछा जा सकता है कि आखिर गांधी ही क्यों?

इसका उत्तर यह नहीं कि भारत में दूसरा कोई महान व्यक्ति था ही नहीं।

बल्कि उत्तर यह है कि इतिहास में अलग-अलग समय पर अलग-अलग व्यक्तित्व अलग-अलग भूमिकाओं में सामने आते हैं।

गांधी उस दौर में एक ऐसा जननेता बने जिसने देश के बहुत बड़े हिस्से को अहिंसक जनआंदोलनों से जोड़ने की क्षमता दिखाई।

उनसे असहमति रखने वाले भी थे।

उनके राजनीतिक तरीकों से असहमत लोग भी थे।

लेकिन उनकी ऐतिहासिक उपस्थिति को मिटा देना संभव नहीं है।

इतिहास किसी व्यक्ति को इसलिए बड़ा नहीं बनाता कि कोई उसे बड़ा कहना चाहता है; इतिहास उसके समय, उसके काम और उसके प्रभाव को दर्ज करता है।

‘राष्ट्रपिता’ भी कोई संवैधानिक पद नहीं है

यह तथ्य भी स्पष्ट होना चाहिए कि ‘राष्ट्रपिता’ गांधी की कोई संवैधानिक या सरकारी पदवी नहीं है।

भारत सरकार के उपलब्ध रिकॉर्ड में गांधी को ‘राष्ट्रपिता’ की कोई औपचारिक सरकारी उपाधि दिए जाने की जानकारी नहीं है।

यह एक लोकप्रिय राष्ट्रीय संबोधन है।

गांधी ने खुद अपने लिए यह पदवी घोषित नहीं की थी।

समाज ने उन्हें ‘बापू’ कहा, लोगों ने उन्हें ‘महात्मा’ कहा और समय के साथ ‘राष्ट्रपिता’ का संबोधन भी लोकप्रिय हुआ।

इसलिए राष्ट्र के इतिहास को समझते समय भावनात्मक संबोधन और संवैधानिक पदवी के बीच अंतर करना जरूरी है।

राष्ट्र का पिता कोई एक व्यक्ति कैसे हो सकता है?

यह सवाल भी अपनी जगह उचित है।

भारत किसी एक व्यक्ति से नहीं बना।

यह देश हजारों वर्षों की सभ्यता, ऋषियों-मुनियों, संतों, समाज सुधारकों, किसानों, मजदूरों, सैनिकों, स्वतंत्रता सेनानियों और करोड़ों आम नागरिकों की सामूहिक यात्रा है।

इस अर्थ में राष्ट्र का कोई जैविक पिता नहीं हो सकता।

इसलिए ‘राष्ट्रपिता’ शब्द को शाब्दिक अर्थ में लेना उचित नहीं है।

लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि गांधी ने खुद को राष्ट्र का पिता घोषित नहीं किया था।

यह संबोधन जनता और इतिहास की स्मृति में विकसित हुआ।

गांधी से असहमति है तो खुलकर कीजिए

गांधी से असहमति कोई अपराध नहीं है।

उनके आर्थिक विचारों से असहमति हो सकती है।

उनके राजनीतिक निर्णयों पर सवाल हो सकते हैं।

उनके सामाजिक विचारों पर बहस हो सकती है।

उनकी निजी जिंदगी पर भी ऐतिहासिक दृष्टि से चर्चा हो सकती है।

लेकिन इन सबके लिए गांधी की किताबें पढ़नी होंगी, उनके समय को समझना होगा, उनके विरोधियों को पढ़ना होगा और फिर अपना निष्कर्ष निकालना होगा।

गांधी को समझे बिना गांधी को खारिज करना उतना ही अधूरा है, जितना गांधी को पढ़े बिना उन्हें महान घोषित कर देना।

जिन्ना और गांधी के बारे में कही जाने वाली बात

गांधी की मृत्यु के बाद मोहम्मद अली जिन्ना सहित पाकिस्तान के नेताओं और जनता की ओर से भी शोक व्यक्त किए जाने के ऐतिहासिक रिकॉर्ड मिलते हैं।

लेकिन सोशल मीडिया पर जिन्ना के नाम से गांधी को ‘अच्छा हिंदू’ कहे जाने वाला एक कथन बहुत वायरल होता है। इस कथन को प्राथमिक और विश्वसनीय स्रोत के बिना निश्चित तथ्य की तरह प्रस्तुत करना उचित नहीं है।

इतिहास के साथ ईमानदारी का अर्थ यही है कि जो प्रमाणित है उसे प्रमाणित कहा जाए और जो संदिग्ध है उसे संदिग्ध।

गांधी पर लिखते हुए भी हमें गांधी के सबसे बड़े सिद्धांत—सत्य—को नहीं भूलना चाहिए।

आज गांधी की तस्वीर से ज्यादा जरूरी गांधी का सवाल है

आज गांधी की तस्वीर पर फूल चढ़ाए जाएंगे।

मालाएं पहनाई जाएंगी।

भाषण होंगे।

सोशल मीडिया पर गांधी जयंती की शुभकामनाएं चलेंगी।

लेकिन शायद गांधी जयंती का सबसे महत्वपूर्ण अर्थ यह नहीं कि हम उनकी तस्वीर के सामने फूल रख दें।

बल्कि यह है कि हम खुद से पूछें—

क्या हम सत्य के प्रति उतने ही ईमानदार हैं, जितनी ईमानदारी की अपेक्षा हम गांधी से करते हैं?

क्या हम किसी वायरल पोस्ट को साझा करने से पहले उसका सच जांचते हैं?

क्या हम इतिहास को अपनी पसंद और नापसंद के हिसाब से बदलने की कोशिश तो नहीं कर रहे?

और गांधी से असहमति रखने वाले हम लोगों का अपने देश और समाज के प्रति योगदान क्या है?

यह सवाल किसी को छोटा करने के लिए नहीं है।

यह सवाल इसलिए है क्योंकि इतिहास पर फैसला सुनाना आसान है, लेकिन इतिहास बनाना कठिन।

गांधी ने अपने जीवन में गलतियां कीं—यह स्वीकार करना गांधी को छोटा करना नहीं है।

गांधी ने देश के लिए बड़ा सार्वजनिक योगदान दिया—यह स्वीकार करना उन्हें भगवान बना देना नहीं है।

दोनों बातें एक साथ सच हो सकती हैं।

और शायद गांधी को समझने का सबसे ईमानदार रास्ता भी यही है।

गांधी की तस्वीर पर फूल चढ़ाने से ज्यादा जरूरी है—इतिहास पर धूल न चढ़ने देना

गांधी को भगवान मत बनाइए।

गांधी को खलनायक भी मत बनाइए।

उन्हें पढ़िए।

उनकी आत्मकथा पढ़िए।

उनकी गलतियां पढ़िए।

उनके प्रयोग पढ़िए।

उनके समर्थकों को पढ़िए।

उनके विरोधियों को पढ़िए।

और फिर अपना निष्कर्ष खुद निकालिए।

क्योंकि गांधी की तस्वीर को फूलों से सजाना एक दिन की परंपरा हो सकती है, लेकिन इतिहास को अफवाहों की धूल से बचाना पूरे समाज की जिम्मेदारी है।

2 अक्टूबर को गांधी की तस्वीर पर फूल चढ़ाने से ज्यादा जरूरी है—इतिहास पर धूल न चढ़ने देना।

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Author: Dhaara News

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