समिति के सदस्यों की नाराजगी, मंडल अध्यक्ष को फोन और विधायक की नसीहत… फिर भी सवाल वही—आखिर सुनवाई किसकी हो रही है?
जिले की सियासत में इन दिनों एक विधायक निवास से जुड़ा चंदे का मामला चर्चा का विषय बना हुआ है। मामला कथित तौर पर लक्ष्मी समिति के लिए मांगी गई सहयोग राशि का है, लेकिन बात इतनी बढ़ गई कि चंदे की मांग से शुरू हुआ घटनाक्रम विवाद और नाराजगी तक पहुंच गया। अब चर्चा इस बात की है कि जब जनप्रतिनिधि के निवास पर ही कार्यकर्ताओं और समिति के लोगों की बात नहीं सुनी जाएगी, तो वे अपनी फरियाद आखिर किसके सामने रखें?
चंदे की मांग से शुरू हुआ विवाद, आवेदन पर बढ़ी बात
मिली जानकारी के मुताबिक, लक्ष्मी समिति के लिए सहयोग राशि मांगने भाजपा युवा मोर्चा (भाजयुमो) के अध्यक्ष और समिति से जुड़े पदाधिकारी विधायक निवास पहुंचे थे। विधायक से सहयोग राशि के संबंध में चर्चा हुई तो उन्होंने आवेदन अपने निज सहायक को देने के लिए कहा। बताया जा रहा है कि आवेदन के माध्यम से स्वेच्छानुदान में कुछ लोगों के नाम शामिल कराने की बात थी।
इसी दौरान समिति के एक सदस्य ने कथित तौर पर पिछली बार की राशि को लेकर सवाल उठा दिया। सदस्य की टिप्पणी थी कि पिछली बार भी सहयोग की बात हुई थी, लेकिन राशि नहीं मिली। बस, इसी बात पर माहौल गर्म होने की चर्चा है।
आवेदन फाड़ने के आरोप से बिगड़ा माहौल
आरोप है कि सदस्य की टिप्पणी से नाराज होकर विधायक के निज सहायक ने आवेदन पत्र फाड़कर फेंक दिया। इसके बाद मामला और गरमा गया। घटनाक्रम के बीच मंडल अध्यक्ष को फोन किए जाने और विधायक निवास में तीखी बहस होने की बात सामने आई है। समिति के सदस्यों ने विधायक का बायकाट करने का प्लान तैयार कर लिया है यह भी कहा जा रहा है कि विधायक को गांव में घुसने नहीं देंगे चाहे कुछ भी हो जाए।
विधायक की नसीहत, लेकिन व्यवस्था पर सवाल बरकरार!
विवाद बढ़ने के बाद विधायक द्वारा संबंधित लोगों को ठीक से काम करने की सलाह दिए जाने की चर्चा है। मगर सवाल यह है कि क्या यह नसीहत केवल मौके तक ही सीमित रह जाएगी, या फिर कार्यकर्ताओं और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की शिकायतों पर कोई ठोस कार्रवाई भी होगी?
स्थानीय स्तर पर यह आरोप भी लगाए जा रहे हैं कि संबंधित गांव के सरपंच को विकास कार्यों में अपेक्षित अवसर नहीं मिल रहे हैं, जबकि कुछ कामों में एजेंसी बदलकर कार्य कराए जाने की बात कही जा रही है। इन आरोपों की पुष्टि संबंधित दस्तावेजों और विभागीय पक्ष से होना बाकी है।
जब ₹1000 के चंदे पर इतनी खींचतान, तो बड़े कामों का क्या?
पूरे मामले में सबसे दिलचस्प सवाल यही है कि समिति के लिए मामूली सहयोग राशि की मांग आखिर इतने बड़े विवाद की वजह कैसे बन गई? समिति के सदस्य अपनी बात रखने पहुंचे थे, लेकिन यदि उनके आरोप सही हैं, तो उन्हें जवाब और समाधान मिलने के बजाय नाराजगी का सामना करना पड़ा।
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी हो रही है कि चंदे और सहयोग के मामले में पूर्व मंत्री से तुलना तक होने लगी है। बताया जा रहा है कि चंदे और जन सहयोग के मामले में पूर्व मंत्री विधायक से आगे निकल गए हैं हालांकि, ऐसी तुलना से ज्यादा जरूरी यह है कि जनप्रतिनिधि के कार्यालय में आने वाले लोगों की शिकायतों को गंभीरता से सुना जाए।
फिलहाल, समिति के सदस्यों की नाराजगी और विधायक निवास से जुड़ा यह कथित विवाद चर्चा में है। अब देखना होगा कि विधायक इस मामले में क्या रुख अपनाते हैं और निज सहायक की भूमिका को लेकर उठ रहे सवालों पर कोई स्पष्टीकरण सामने आता है या नहीं।
क्योंकि जनता और कार्यकर्ताओं के लिए जनप्रतिनिधि का दरवाजा सिर्फ मिलने की जगह नहीं, बल्कि अपनी समस्या रखने की उम्मीद भी होता है।






