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दुर्ग जिले की एक ग्राम पंचायत में विकास का ‘नया मॉडल’! ₹2.30 लाख की योजना, ₹5 से ₹7 लाख का काम! आखिर ठेकेदार इतना क्यों मेहरबान?

 

दुर्ग जिले की एक ग्राम पंचायत इन दिनों अपने कथित “विकास मॉडल” को लेकर चर्चा का केंद्र बनी हुई है। पूर्व कार्यकाल के जांच और माप पुस्तिका (एम.बी.) के अवलोकन में ऐसे तथ्य सामने आए हैं, जिन्होंने ग्रामीणों के साथ-साथ तकनीकी जानकारों को भी हैरानी में डाल दिया है।

जांच में सामने आया कि जिस कार्य के लिए लगभग ₹2.30 लाख की स्वीकृति थी, वह कार्य निर्धारित स्थान पर नहीं मिला। वहीं, तकनीकी मूल्यांकन में संबंधित स्थल पर यहां वहां, इधर उधर ₹5 से ₹7 लाख से अधिक मूल्य का कार्य दिखाई देने की बात सामने आई। अब सवाल यह है कि जब स्वीकृत राशि सीमित थी, तो अतिरिक्त लाखों रुपये आखिर आए कहां से?

ग्रामीण व्यंग्य में कह रहे हैं—

“लगता है इस पंचायत में ठेकेदार लाभ कमाने नहीं, दान-पुण्य करने आते हैं। सरकार ढाई लाख देती है और ठेकेदार अपनी जेब से लाखों रुपये लगाकर विकास कर देता है!

चर्चा यह भी है कि पंचायतों में ठेकेदारी प्रथा प्रतिबंधित होने के बावजूद पूरा कार्य एक ही ठेकेदार द्वारा कराया गया। ऐसे में लोग पूछ रहे हैं कि आखिर कोई ठेकेदार बिना किसी स्पष्ट वित्तीय आधार के अपनी जेब से लाखों रुपये क्यों लगाएगा?

इसी कारण अब पंचायत के मास्टर रोल, बिल-वाउचर, भुगतान रजिस्टर, माप पुस्तिका तथा समस्त विकास कार्यों की विस्तृत जांच की मांग तेज हो गई है। यदि ₹5 से ₹7 लाख के कार्य के अनुरूप भुगतान, बिल या मजदूरों के नाम मास्टर रोल में दर्ज पाए जाते हैं, तो यह मामला और बड़े वित्तीय अनियमितताओं की ओर संकेत कर सकता है।

ग्रामीणों के बीच एक और चर्चा जोरों पर है। उनका कहना है कि कहीं 15वें वित्त आयोग की राशि का भी बंदरबांट तो नहीं किया गया? हालांकि, यह फिलहाल ग्रामीणों द्वारा व्यक्त किया जा रहा संदेह है, जिसकी पुष्टि केवल सक्षम जांच से ही हो सकेगी।

गांव में लोग अब तंज कसते हुए कह रहे हैं—

«”यहां विकास नहीं, चमत्कार होता है। योजना ढाई लाख की आती है, काम सात लाख का दिखाई देता है और हिसाब-किताब शायद अभी खुलना बाकी है।”»

अब सबकी निगाहें इस बात पर हैं कि यदि पंचायत के सभी वित्तीय अभिलेखों और विकास कार्यों की निष्पक्ष जांच होती है, तो क्या यह मामला केवल एक कार्य तक सीमित रहेगा या फिर पूरे पंचायत के वित्तीय प्रबंधन की नई परतें सामने आएंगी। अंतिम सत्य तो जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएगा, लेकिन फिलहाल यह पंचायत अपने “अनोखे विकास मॉडल” को लेकर चर्चा में जरूर है।

कुछ ग्रामीण तंज कसते हुए कहते हैं—

«”जब लाखों रुपये अपनी जेब से लगाकर अतिरिक्त निर्माण किया जा सकता है, तो फिर किसी शौचालय का सेप्टिक टैंक अधूरा क्यों रह जाता है? वहां अपनी जेब का पैसा क्यों नहीं लगता?”»

गांव की चौपालों से लेकर चाय की दुकानों तक इस मामले की चर्चा है। लोग कहते हैं कि मामला अब इतना चर्चित हो चुका है कि लोगों के पेट में बात नहीं रुक रही है।

इसी बीच व्यंग्य में कुछ ग्रामीण यह भी कह रहे हैं—

«”अब देखना यह है कि विस्तृत जांच के बाद बड़ी कार्रवाई होती है या फिर ऐसे अद्भुत ‘विकास मॉडल’ के लिए किसी विशेष सम्मान का लेखा-जोखा तैयार किया जाता है!”»

हालांकि, यह सभी टिप्पणियां ग्रामीणों के बीच चल रही चर्चाओं और व्यंग्यात्मक प्रतिक्रियाओं के रूप में सामने आ रही हैं। वास्तविक स्थिति और किसी भी प्रकार की जवाबदेही का निर्धारण सक्षम जांच और प्रशासनिक कार्रवाई के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।

फिलहाल, पंचायत के समस्त विकास कार्यों, माप पुस्तिकाओं, बिल-वाउचर, मास्टर रोल तथा वित्तीय अभिलेखों की जांच की मांग लगातार तेज होती जा रही है। यदि विस्तृत जांच होती है, तो पंचायत के वित्तीय प्रबंधन से जुड़े कई और तथ्य सामने आ सकते हैं।

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Author: Dhaara News

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