दुर्ग जिला पंचायत में 16वें वित्त के बंटवारे को लेकर घमासान, किसी सदस्य के क्षेत्र में 10 लाख तो किसी के हिस्से में 50-60 लाख का आरोप
दुर्ग। आखिर दुर्ग जिले की जनता कब तक विकास के नाम पर होने वाली कथित राजनीतिक खींचतान का खामियाजा भुगतती रहेगी? क्या पंचायतों में विकास की राशि का बंटवारा जनसंख्या, क्षेत्र की जरूरत और विकास की प्राथमिकता के आधार पर होना चाहिए या फिर बहुमत और राजनीतिक समीकरण इसके निर्धारक बनेंगे? जिला पंचायत दुर्ग में 16वें वित्त की राशि के कथित असमान वितरण को लेकर उठे विवाद ने इन सवालों को एक बार फिर सामने ला दिया है।
दुर्ग जिला पंचायत में 16वें वित्त की राशि के आवंटन को लेकर कांग्रेस समर्थित सदस्यों द्वारा गंभीर आपत्ति दर्ज कराए जाने और बैठक के बहिष्कार की खबर सामने आई है। आरोप है कि कुछ सदस्यों के क्षेत्र के लिए करीब 50 लाख रुपये से अधिक, जबकि विरोध करने वाले सदस्यों के क्षेत्रों के लिए लगभग 10 लाख रुपये के आसपास राशि का प्रस्ताव किया गया। यदि यह आरोप दस्तावेजों में सही साबित होता है तो समान रूप से निर्वाचित जिला पंचायत सदस्यों के क्षेत्रों के बीच इतना बड़ा अंतर अपने आप में जांच का विषय बन जाता है।
एक ही जिले के सदस्य, लेकिन विकास राशि में इतना बड़ा अंतर क्यों?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि दो जिला पंचायत क्षेत्रों की आबादी और मतदाता संख्या लगभग समान है, तो एक क्षेत्र को 10 लाख और दूसरे को 50-60 लाख रुपये तक की राशि देने का आधार क्या है?
क्या इसके पीछे कोई स्वीकृत मापदंड है?
क्या क्षेत्रफल, जनसंख्या, पिछड़ापन, अधोसंरचना की आवश्यकता अथवा किसी अन्य तकनीकी फार्मूले के आधार पर राशि तय की गई है?
यदि ऐसा कोई मापदंड है तो उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा?
छत्तीसगढ़ में पंचायत स्तर पर वित्तीय आवंटन के संबंध में विभिन्न वित्त आयोगों ने जनसंख्या जैसे मानकों को महत्व दिया है। राज्य वित्त आयोग की उपलब्ध सामग्री में भी पंचायतों के बीच राशि वितरण में जनसंख्या आधारित मानदंड का उल्लेख मिलता है।
ऐसे में दुर्ग जिला पंचायत में प्रस्तावित राशि के अंतर को लेकर उठे सवालों का जवाब दस्तावेज और निर्धारित नियम ही दे सकते हैं।
15वें वित्त के बाद अब 16वें वित्त पर सवाल
यह विवाद केवल 16वें वित्त तक सीमित नहीं बताया जा रहा है। आरोप है कि इससे पहले 15वें वित्त की राशि के वितरण को लेकर भी जनपद पंचायत दुर्ग में सदस्यों के बीच असमानता के आरोप सामने आए थे। कथित तौर पर 13 सदस्यों के बहुमत से राशि के वितरण का फैसला हुआ और बाकी 11 जनपद सदस्य अपने क्षेत्रों के लिए अपेक्षित विकास राशि से वंचित रह गए।
यदि ऐसा हुआ है तो सवाल केवल राजनीतिक दलों का नहीं, बल्कि उन गांवों के विकास का है जहां सड़क, नाली, सामुदायिक भवन, पेयजल और अन्य बुनियादी जरूरतों के लिए पंचायत प्रतिनिधि लगातार राशि की मांग करते हैं।
क्या राजनीतिक विचारधारा विकास का पैमाना बन रही है?
विवाद को और गंभीर बनाने वाला आरोप यह है कि भाजपा समर्थित अथवा भाजपा विचारधारा से जुड़े सदस्यों के क्षेत्रों को कथित रूप से 50 लाख रुपये से अधिक की राशि और दूसरे सदस्यों के क्षेत्रों को करीब 10 लाख रुपये की राशि दिए जाने का प्रस्ताव किया गया।
यह आरोप यदि सही है तो इसकी निष्पक्ष जांच जरूरी है।
क्योंकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता ने किसी सदस्य को जिस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने के लिए चुना है, वहां विकास की जरूरत राजनीतिक पहचान देखकर तय नहीं होनी चाहिए।
किसी क्षेत्र की जनता ने भाजपा को वोट दिया या कांग्रेस को, किसी अन्य दल अथवा निर्दलीय प्रत्याशी को समर्थन दिया—सरकारी विकास योजनाओं और सार्वजनिक निधि के उपयोग में इसका आधार बनाया जाना है या नहीं, यह स्पष्ट होना चाहिए।
कलेक्टर के अधिकार क्षेत्र पर भी उठे सवाल
दुर्ग जिला प्रशासन में अभिजीत सिंह कलेक्टर एवं जिला दंडाधिकारी, की महत्वपूर्ण भूमिका में हैं। ऐसे में जिले में प्रशासनिक स्तर पर पंचायतों और विकास कार्यों से जुड़े मामलों की निगरानी को लेकर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।
सवाल यह नहीं है कि जिला पंचायत के निर्वाचित प्रतिनिधियों को अपने स्तर पर निर्णय लेने का अधिकार है या नहीं।
सवाल यह है कि यदि किसी निर्णय पर निर्वाचित सदस्यों का एक वर्ग गंभीर असमानता और राजनीतिक भेदभाव का आरोप लगाता है, तो क्या जिला प्रशासन को उस शिकायत के दस्तावेजों की जांच नहीं करनी चाहिए?
क्या यह देखा नहीं जाना चाहिए कि राशि आवंटन का आधार क्या था?
क्या सभी सदस्यों के क्षेत्र के लिए समान मापदंड अपनाए गए?
और यदि मापदंड अलग-अलग थे तो उसका लिखित कारण क्या है?
कलेक्टर से सीधा सवाल—आखिर संज्ञान कब?
दुर्ग की जनता कलेक्टर अभिजीत सिंह से यह जानना चाहती है कि यदि जिला पंचायत में 16वें वित्त की राशि को लेकर इतने गंभीर आरोप सामने आए हैं तो प्रशासन इसकी निष्पक्ष दस्तावेजी जांच कब कराएगा?
क्या प्रस्तावित राशि का सदस्यवार विवरण सार्वजनिक कराया जाएगा?
क्या प्रत्येक क्षेत्र के लिए राशि निर्धारित करने का आधार बताया जाएगा?
क्या जनसंख्या और क्षेत्रफल सहित निर्धारित मानकों का परीक्षण किया जाएगा?
और यदि जांच में कहीं नियमों से हटकर या भेदभावपूर्ण आवंटन पाया जाता है तो क्या उस पर कार्रवाई होगी?
विकास में राजनीति हुई तो भुगतेगी जनता
राजनीतिक दल और निर्वाचित प्रतिनिधि अपनी-अपनी विचारधारा के साथ राजनीति कर सकते हैं, लेकिन सरकारी विकास राशि का अंतिम लाभ जनता को मिलना चाहिए।
दुर्ग जिले के गांवों में रहने वाले लोगों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनका जिला पंचायत सदस्य किस दल के करीब है। उन्हें सड़क चाहिए, नाली चाहिए, पानी चाहिए, स्कूल और सामुदायिक सुविधाएं चाहिए।
ऐसे में यदि किसी क्षेत्र को कथित तौर पर 10 लाख और किसी दूसरे क्षेत्र को 50-60 लाख रुपये मिलते हैं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि यह अंतर विकास की वास्तविक जरूरत का है या राजनीतिक समीकरण का?
इस पूरे मामले में अब सबसे महत्वपूर्ण भूमिका दस्तावेजों की है।
कौन कितना पैसा पा रहा है, किस आधार पर पा रहा है और किस नियम के तहत पा रहा है—अगर इन तीन सवालों का पारदर्शी जवाब सामने आ जाए तो विवाद की तस्वीर खुद साफ हो जाएगी
फिलहाल जिला पंचायत दुर्ग के भीतर उठे सवालों ने प्रशासन के सामने भी एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है—विकास की राशि में पारदर्शिता सुनिश्चित करना और यह भरोसा कायम करना कि सरकारी पैसा किसी राजनीतिक खेमे का नहीं, बल्कि जनता का है।






