रिसाली भाजपा में टिकट की जंग: निष्ठा भारी पड़ेगी या ‘जीताऊ चेहरे’?
रिसाली। नगर निगम चुनाव की तैयारियों के बीच रिसाली भाजपा में टिकट को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि वर्षों से पार्टी के लिए काम करने वाले कर्मठ कार्यकर्ताओं को टिकट मिलेगा या फिर कांग्रेस से भाजपा में आए पार्षदों और नेताओं पर पार्टी दोबारा भरोसा जताएगी।
मामला इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि रिसाली भाजपा के राजनीतिक इतिहास में निष्कासन और वापसी की लंबी कहानी रही है।
23 बागियों पर हुई थी बड़ी कार्रवाई
वर्ष 2021 के नगर निगम चुनाव के दौरान पार्टी के अधिकृत प्रत्याशियों के खिलाफ चुनाव मैदान में उतरने वाले रिसाली के 23 भाजपा नेताओं/कार्यकर्ताओं को छह साल के लिए निष्कासित किया गया था। इनमें वार्ड 2 से टीकम साहू, वार्ड 5 से नेहा सिंह, वार्ड 6 से संगीता साहू व अर्चना पांडे, वार्ड 9 से बी. लक्ष्मी नारायण, वार्ड 10 से खिलेश्वरी, वार्ड 13 से हरिशंकर राजा, वार्ड 14 से शांति बाई व ज्योति यादव, वार्ड 15 से दिनेश कुमार, रामप्रकाश यादव व चंद्रशेखर यादव सहित अन्य नाम शामिल थे।
इसी सूची में वार्ड 23 की रीना नैय्यर, वार्ड 24 के आसपूरन चौधरी व विमलेश जैन, वार्ड 25 के मोरध्वज चंद्राकर, वार्ड 27 की सुनंदा चंद्राकर, वार्ड 28 के विपिन सिंह, वार्ड 29 के कमलेश हिरवानी, वार्ड 34 के डोमन लाल बारले, वार्ड 36 के गोविंद राम साहू, वार्ड 37 की चित्रकला देशलहरे और वार्ड 38 की पार्वती महानंद भी शामिल थी।
वक्त बदला, समीकरण बदले और कई चेहरे फिर सक्रिय
अब राजनीतिक तस्वीर पहले जैसी नहीं है। निष्कासन सूची में शामिल रहे कई चेहरे वापस भाजपा में आ चुके हैं या उनका निष्कासन बहाल हो चुका है। इनमें कुछ नेता चुनावी राजनीति में भी सक्रिय रहे हैं।
इस बीच सूची में शामिल रहे सुनंदा चंद्राकर पार्षद बन चुकी हैं, जो महापौर के लिए निर्दलीय ताल ठोंकी थीं, जबकि गोविंद राम साहू वर्तमान में विधायक प्रतिनिधि की भूमिका में हैं। वहीं तत्कालीन समय में निर्वाचित हुए पार्षद टीकम साहू और डोमन लाल बारले का निधन हो चुका है।
यानी छह साल के निष्कासन की वह सूची, जो कभी भाजपा के भीतर अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रतीक बनी थी, आज टिकट के समीकरणों में ही एक नया अध्याय बनती नजर आ रही है।
‘निष्ठावान कार्यकर्ता’ पूछ रहे सवाल
भाजपा के पुराने कार्यकर्ताओं के बीच अब चर्चा है कि जिन्होंने संगठन के लिए वर्षों तक बूथ से लेकर वार्ड तक मेहनत की, क्या टिकट के समय उनकी निष्ठा को प्राथमिकता मिलेगी?
या फिर चुनावी गणित को देखते हुए कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए नेताओं और प्रभावशाली पूर्व पार्षदों को टिकट देकर पार्टी ‘जीताऊ चेहरे’ के फार्मूले पर आगे बढ़ेगी?
यही सवाल रिसाली भाजपा की अंदरूनी राजनीति में सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बना हुआ है।
वार्डवार आरक्षण खोलेगी भाजपा की रणनीति का राज
रिसाली में टिकट वितरण भाजपा के लिए आसान नहीं रहने वाला। एक तरफ पुराने और समर्पित कार्यकर्ताओं की दावेदारी, दूसरी तरफ दल-बदल कर आए नेताओं का राजनीतिक प्रभाव, और तीसरी तरफ पूर्व में निष्कासित लेकिन अब पार्टी में सक्रिय हो चुके चेहरों की दावेदारी—इन तीनों के बीच संतुलन साधना संगठन के लिए बड़ी चुनौती होगी।
फिलहाल भाजपा की ओर से किसी नाम को अंतिम टिकट दिए जाने की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। इसलिए जिन नेताओं के नाम चर्चा में हैं, उन्हें संभावित दावेदार के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
लेकिन रिसाली में सियासी सवाल अब साफ है—
भाजपा टिकट बांटेगी ‘निष्ठा’ के आधार पर या ‘जीत की गारंटी’ के नाम पर?
और अगर पुराने बागियों में से कुछ को फिर टिकट मिलता है तथा कांग्रेस से आए नेताओं को भी मौका मिलता है, तो वर्षों से संगठन के साथ खड़े कार्यकर्ताओं के बीच उठने वाला सवाल और तीखा हो सकता है—
“पार्टी के लिए संघर्ष हमारा, टिकट का इनाम किसी और का?”








