
दुर्ग (छत्तीसगढ़), 08 दिसंबर 2025: दुर्ग जिले के ग्राम रूदा में जल जीवन मिशन के तहत बनी एक अनोखी पानी की टंकी ने पूरे देश का ध्यान खींच लिया है। केवल RCC का आधार बनाकर उस पर सीधे जिंक-एल्यूमिनियम की टंकी रखने का यह “इंजीनियरिंग चमत्कार” इतना अनूठा है कि स्थानीय नागरिक इसे “विश्व का आठवाँ अजूबा” घोषित करने और इसके जनक, प्रभारी कार्यपालन अभियंता (लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग) श्री उत्कर्ष पांडेय को भारत रत्न से सम्मानित करने की मांग कर रहे हैं।
जिला युवा कांग्रेस (ग्रामीण) के उपाध्यक्ष धर्मेश देशमुख ने आज जिलाधीश दुर्ग को एक औपचारिक पत्र सौंपकर यह मांग रखी है। पत्र में कहा गया है कि ठेकेदार कमल कुमार अग्रवाल (PWD लाइसेंस) को पहले 12.49 लाख रुपये में RCC ओवरहेड टंकी का काम दिया गया था, लेकिन केवल आधार बनाकर ऊपर की कंक्रीट टंकी न बनाते हुए बाद में रिवाइज्ड अनुमान से 12.95 लाख में जिंक-एल्यूमिनियम टंकी लगा दी गई। इस प्रक्रिया में शासन को 46 हजार रुपये का अतिरिक्त व्यय भार वहन करना पड़ा।
श्री देशमुख ने व्यंग्यात्मक लहजे में लिखा है,
“दुर्ग जिले में करीब 300 पानी टंकियों में से सिर्फ एक ही जगह यह अनोखा प्रयोग हुआ और वह भी मीडिया में मामला उजागर होने के बाद। धातु की टंकी को सीधे RCC सतह पर रखने से पानी के निरंतर संपर्क में आने से जंग लगने और जनस्वास्थ्य को खतरे की आशंका है। यह इंजीनियरिंग का ऐसा विश्व रिकॉर्ड है जो न लिम्का बुक में दर्ज है, न गिनीज बुक में। इसलिए इसे तुरंत दोनों में दर्ज कराया जाए और आविष्कारक श्री उत्कर्ष पांडेय को 26 जनवरी 2025 को भारत रत्न देकर सम्मानित किया जाए।”
पत्र में जिलाधीश पर भी तंज कसा गया है कि रिवाइज्ड अनुमान को उनकी स्वीकृति के बिना पास करना गैर-कानूनी है, फिर भी कोई जांच या कार्रवाई नहीं हुई, जिससे उनकी “मौन सहमति” सिद्ध होती है।
श्री देशमुख ने घोषणा की है कि जल्द ही माननीय राज्यपाल के नाम हस्ताक्षर अभियान चलाया जाएगा ताकि “इस ऐतिहासिक इंजीनियरिंग धरोहर” को संरक्षित किया जाए और श्री पांडेय को भारत रत्न दिलाया जाए।
पत्र की प्रतिलिपि प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) के जॉइंट सेक्रेटरी को भी भेजी गई है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि यह टंकी सचमुच “आठवाँ अजूबा” है तो इसे पर्यटक स्थल बनाकर टिकट लगाकर आमदनी भी की जा सकती है, साथ ही देश-दुनिया के इंजीनियरिंग छात्रों के लिए इसे पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए।
अब देखना यह है कि यह व्यंग्यपूर्ण मांग कब तक सरकारी फाइलों से निकलकर भारत रत्न की सूची में जगह बना पाती है या फिर यह अनोखी टंकी वाकई विश्व रिकॉर्ड की श्रेणी में दर्ज हो पाती है!








