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छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद का अंत और आदिवासियों की चिंताएं: विकास के नाम पर जमीन का खेल?

छत्तीसगढ़, जो अपनी प्राकृतिक संपदा और आदिवासी संस्कृति के लिए जाना जाता है, इन दिनों एक दोहरी चुनौती से जूझ रहा है। एक ओर राज्य सरकार और सुरक्षा बल नक्सलवाद के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई कर रहे हैं, जिसके परिणामस्वरूप नक्सलियों का प्रभाव कम हो रहा है। दूसरी ओर, स्थानीय निवासी, खासकर आदिवासी समुदाय, इस बात से चिंतित हैं कि कहीं यह ‘सफाई अभियान’ उद्योगपतियों को जंगल और जमीन सौंपने का बहाना तो नहीं बन रहा। बस्तर जिले में डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड (DRG) के जवान शहीद हो रहे हैं, नक्सली मारे जा रहे हैं, लेकिन सवाल यह है कि नक्सलियों की मांगें और कार्य भले ही गलत हों, क्या सरकार आदिवासियों को उनके हक-हकूक से वंचित कर रही है? प्रदेश में पुलिस प्रशासन और स्थानीय नागरिकों की झड़पें बढ़ रही हैं, और राजनांदगांव से लेकर रायगढ़ तक जमीन अधिग्रहण को लेकर बवाल मचा हुआ है। इस आलेख में हम इन मुद्दों की गहराई से पड़ताल करेंगे, ताकि छत्तीसगढ़ की आम जनता सूक्ष्मता से सोच-समझ सके और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो।

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नक्सलवाद का खात्मा: सफलता या नई शुरुआत?
2025 में छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के खिलाफ अभियान ने नई रफ्तार पकड़ी है। केंद्र सरकार की मुहिमों के तहत सुरक्षा बलों ने माओवादियों पर करारा प्रहार किया है। इस वर्ष अब तक सैकड़ों नक्सली मारे गए हैं, जबकि कई ने आत्मसमर्पण किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे ‘नक्सलवाद से मुक्ति’ का अभियान बताया है, और गृह मंत्री अमित शाह ने मार्च 2026 तक नक्सलवाद को पूरी तरह समाप्त करने का लक्ष्य रखा है। बस्तर जैसे इलाकों में DRG और अन्य फोर्सेस की सक्रियता से नक्सलियों का आधार कमजोर हुआ है, लेकिन इस प्रक्रिया में आदिवासी इलाकों में मिलिटराइजेशन बढ़ गया है।
नक्सलियों की मांगें—जैसे जमीन का बंटवारा और शोषण के खिलाफ संघर्ष—भले ही हिंसक हों, लेकिन वे आदिवासियों की वास्तविक पीड़ा को दर्शाती हैं। नक्सलवाद का जन्म ही ग्रामीण असमानता और विकास की कमी से हुआ था। अब जब उनका खात्मा हो रहा है, तो सवाल उठता है: क्या सरकार इन मूल मुद्दों को हल कर रही है, या सिर्फ सतही जीत का जश्न मना रही है? कई रिपोर्ट्स बताती हैं कि इससे आदिवासी समुदायों में असुरक्षा की भावना बढ़ी है।

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आदिवासियों के अधिकार: संशय और वास्तविकता
नक्सलवाद के बहाने आदिवासी इलाकों में बढ़ती सैन्य मौजूदगी ने स्थानीय लोगों में डर पैदा किया है। पांचवीं अनुसूची वाले क्षेत्रों (जैसे बस्तर) में PESA कानून आदिवासियों को उनकी जमीन और संसाधनों पर नियंत्रण देता है, लेकिन व्यावहारिक रूप से यह अक्सर नजरअंदाज होता है। कई आदिवासी चिंतित हैं कि नक्सलवाद खत्म होने के बाद सरकार जंगलों को उद्योगों के हवाले कर देगी, जिससे उनका विस्थापन हो जाएगा। ऑपरेशन के तहत बढ़ते कैंपों ने गांवों को ‘वारजोन’ जैसा बना दिया है, जहां फेक एनकाउंटर और गिरफ्तारियों की शिकायतें आम हैं।
प्रदेश में पुलिस और नागरिकों की झड़पें इस संशय को और गहरा करती हैं। नक्सलवाद विरोधी अभियानों में आदिवासी अक्सर बीच में फंस जाते हैं, और उनकी आवाज दब जाती है। क्या विकास का मतलब सिर्फ उद्योग स्थापित करना है, या आदिवासियों की संस्कृति और जीविका को बचाना भी? यह सवाल हर छत्तीसगढ़वासी को सोचने पर मजबूर करता है।


मीडिया की भूमिका: उद्योगपतियों का संरक्षण और आवाजों का दमन
इस पूरे परिदृश्य में एक और गंभीर चिंता है—प्रमुख मीडिया घरानों की भूमिका। कई छत्तीसगढ़वासियों का डर है कि मुख्यधारा का मीडिया बड़े उद्योगपतियों (जैसे अडानी और जिंदल ग्रुप) को संरक्षण दे रहा है, जबकि आदिवासियों और किसानों के विरोध को या तो नजरअंदाज किया जा रहा है या उन्हें हिंसक और अवरोधक के रूप में चित्रित किया जा रहा है। उदाहरण के लिए, रायगढ़ और सरगुजा में कोल माइन विस्तार के विरोध में हुई झड़पों को मुख्यधारा की मीडिया ने अक्सर “कानून-व्यवस्था की समस्या” के रूप में दिखाया, जहां पुलिस की कार्रवाई को जायज ठहराया गया, लेकिन ग्रामीणों की शिकायतें—जैसे बिना सहमति के जमीन अधिग्रहण या फर्जी जनसुनवाई—कम कवर हुईं।
स्वतंत्र और वैकल्पिक मीडिया (जैसे फ्रंटलाइन, न्यूजक्लिक या स्थानीय एक्टिविस्ट रिपोर्ट्स) में इन मुद्दों पर गहन कवरेज मिलता है, जहां अडानी प्रोजेक्ट्स पर ग्राम सभा की सहमति फर्जी होने या कॉर्पोरेट दबाव की बातें उजागर होती हैं। लेकिन बड़े मीडिया हाउस अक्सर चुप रहते हैं या सरकार के विकास narrative को बढ़ावा देते हैं। यह डर हर छत्तीसगढ़ी को सताता है कि उनकी आवाज दबाई जा रही है—कॉर्पोरेट प्रभाव, विज्ञापनों की निर्भरता या दबाव के कारण मीडिया आदिवासियों की पीड़ा को प्रमुखता से नहीं दिखा रहा। इससे लोकतंत्र में असंतुलन पैदा होता है, जहां एक पक्ष की बात जोर से सुनाई देती है, और दूसरा पक्ष खामोश रहने पर मजबूर। क्या मीडिया सच्चाई की रखवाली कर रहा है, या सिर्फ सत्ता और पूंजी के हितों की?
जमीन अधिग्रहण का बवाल: जिलों की कहानी
छत्तीसगढ़ में जमीन अधिग्रहण को लेकर विवाद कोई नया नहीं है, लेकिन हाल के वर्षों में यह और तेज हुआ है। सरकार की नीति से लगता है कि उद्योगपतियों को प्राथमिकता दी जा रही है, जबकि स्थानीय किसान और आदिवासी विरोध कर रहे हैं। आइए कुछ प्रमुख जिलों पर नजर डालें:
बस्तर जिला: यहां माइनिंग प्रोजेक्ट्स बढ़ रहे हैं, जिससे स्थानीय लोगों में आक्रोश है। आदिवासियों की जमीन पर कब्जे की शिकायतें हैं।
राजनांदगांव जिला: वन भूमि पर आदिवासियों के दावों को मान्यता देने में देरी हो रही है। जमीन अधिग्रहण के विरोध में पुलिस और ग्रामीणों की झड़पें हुई हैं। सीमेंट फैक्ट्री का भी यहां विरोध किया जा रहा है पर्यावरण विभाग भिलाई के चक्कर से लेकर जनसुनवाई का विरोध भी हो रही किया जा रहा है जहां एक छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में कथित तौर पर एक अच्छे चैनल के पत्रकार ने सीमेंट फैक्ट्री के पक्ष में रिपोर्टिंग करने की कोशिश की थी जिस पर बवाल भी हो गया हालांकि वह रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हो पाया.
रायगढ़ जिला: यह जिला जमीन घोटालों और कोल माइन विवादों का केंद्र रहा है। जिंदल पावर और अडानी से जुड़े प्रोजेक्ट्स के लिए जनसुनवाई को फर्जी बताकर ग्रामीण विरोध कर रहे हैं। हाल में पारसोड़ी कलां और तमनार में हिंसक झड़पें हुईं, जहां पुलिस घायल हुई, लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि सहमति के बिना काम हो रहा है।
ये उदाहरण दिखाते हैं कि पूरे प्रदेश में जमीन अधिग्रहण विकास के नाम पर हो रहा है, लेकिन इसमें पारदर्शिता की कमी है। आदिवासी इलाकों में भूमि अधिग्रहण पर प्रतिक्रियाएं तीव्र हैं, क्योंकि यह उनकी जीविका से जुड़ा है।
निष्कर्ष : सोचने-समझने का समय
छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद का खात्मा एक सकारात्मक कदम है, लेकिन इसे आदिवासियों के अधिकारों की कीमत पर नहीं होना चाहिए। सरकार को सुनिश्चित करना होगा कि विकास समावेशी हो, जहां उद्योगों के साथ-साथ स्थानीय समुदायों की आवाज सुनी जाए। मीडिया को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए—सभी पक्षों को बराबर स्थान देकर। आम जनता को इन मुद्दों पर सूक्ष्मता से विचार करना चाहिए: क्या हमारी सरकार और मीडिया सच्चे अर्थ में न्यायपूर्ण हैं? क्या जमीन अधिग्रहण से लाभ आम आदमी को मिलेगा, या सिर्फ कुछ उद्योगपतियों को? यह समय है जागरूक होने का, सवाल पूछने का और अपने हक के लिए आवाज उठाने का। यदि हम सोच-समझकर कदम उठाएं, तो छत्तीसगढ़ सही मायने में प्रगति कर सकता है।

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Author: dhaaranews

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