रिसाली। आगामी रिसाली नगर निगम चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज होती जा रही है। महापौर और पार्षद पदों के लिए संभावित दावेदारों की सक्रियता के बीच अब ‘स्थानीय को प्राथमिकता’ का मुद्दा सोशल मीडिया और राजनीतिक चर्चाओं में तेजी से उठने लगा है। कुछ सोशल मीडिया ग्रुपों में ऐसे संदेश प्रसारित हो रहे हैं, जिनमें दावा किया जा रहा है कि दूसरे विधानसभा क्षेत्रों से जुड़े कुछ लोग रिसाली में अपने रिश्तेदारों या परिचितों के यहां रहकर चुनावी टिकट की संभावनाएं तलाश रहे हैं।
इन चर्चाओं में स्थानीय कार्यकर्ताओं की ओर से यह सवाल उठाया जा रहा है कि जिस व्यक्ति ने वर्षों से रिसाली क्षेत्र में रहकर संगठन और जनता के बीच काम किया है, टिकट वितरण में उसकी दावेदारी को प्राथमिकता क्यों नहीं मिलनी चाहिए? वहीं दूसरी ओर, पार्टी के स्तर पर अभी किसी व्यक्ति को टिकट दिए जाने अथवा किसी दावेदार को आधिकारिक रूप से स्वीकार किए जाने की स्थिति सामने नहीं आई है। इसलिए सोशल मीडिया में चल रही इन चर्चाओं को फिलहाल राजनीतिक अटकलों और कार्यकर्ताओं की राय के रूप में ही देखा जा रहा है।
स्थानीय चेहरा ही महापौर का दावेदार हो—उठ रही मांग
रिसाली निगम क्षेत्र में चुनावी चर्चा का सबसे बड़ा केंद्र महापौर पद को लेकर दिखाई दे रहा है। स्थानीय स्तर पर सक्रिय कुछ कार्यकर्ताओं और समर्थकों का मानना है कि महापौर पद के लिए ऐसे चेहरे को सामने लाया जाना चाहिए, जो रिसाली की स्थानीय समस्याओं, वार्डों की स्थिति और यहां के मतदाताओं से लंबे समय से जुड़ा हो।
सोशल मीडिया पर चल रही चर्चाओं में यह तर्क भी दिया जा रहा है कि चुनाव के समय अचानक क्षेत्र में सक्रिय होने के बजाय दावेदार का क्षेत्र के लोगों के बीच लगातार संपर्क और सामाजिक उपस्थिति भी महत्वपूर्ण होनी चाहिए।
तिरंगा यात्रा में दिखी दावेदारों की सक्रियता
इधर भारतीय जनता पार्टी द्वारा आयोजित तिरंगा यात्रा में भी संभावित टिकट दावेदारों और उनके समर्थकों की सक्रियता चर्चा का विषय रही। यात्रा के दौरान बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं की मौजूदगी दिखाई दी, लेकिन राजनीतिक नजर रखने वालों का कहना है कि इनमें कुछ ऐसे चेहरे भी नजर आए जो आगामी निगम चुनाव में टिकट की दावेदारी को लेकर सक्रिय माने जा रहे हैं।
हालांकि भीड़ में किसी व्यक्ति की मौजूदगी को सीधे टिकट की दावेदारी का प्रमाण नहीं माना जा सकता, लेकिन चुनाव नजदीक आने के साथ राजनीतिक कार्यक्रमों में नेताओं और संभावित दावेदारों की सक्रियता को लेकर चर्चाएं स्वाभाविक रूप से तेज हो गई हैं।
पुराने कार्यकर्ताओं की कम मौजूदगी भी बनी चर्चा का विषय
तिरंगा यात्रा को लेकर एक और चर्चा पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं की उपस्थिति को लेकर रही। कुछ राजनीतिक कार्यकर्ताओं का दावा है कि संगठन से लंबे समय से जुड़े कुछ पुराने चेहरे अपेक्षाकृत कम दिखाई दिए, जबकि नए और हाल के वर्षों में सक्रिय हुए चेहरों की संख्या अधिक नजर आई।
इसे लेकर कार्यकर्ताओं के बीच अलग-अलग तरह की चर्चाएं हैं। कुछ लोग इसे सामान्य राजनीतिक गतिविधि मान रहे हैं, जबकि कुछ पुराने कार्यकर्ताओं में उपेक्षा की भावना या संगठन में प्राथमिकता बदलने की चर्चा कर रहे हैं। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
‘नए चेहरों’ को प्राथमिकता या चुनावी रणनीति?
रिसाली की राजनीति में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आगामी चुनाव में पार्टी स्थानीय और पुराने कार्यकर्ताओं के अनुभव को प्राथमिकता देगी या नए चेहरों को मौका देकर नई राजनीतिक टीम तैयार करेगी।
दूसरी तरफ, स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि यदि लंबे समय से संगठन के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं को टिकट नहीं मिला तो इसका असर चुनावी मैदान में दिखाई दे सकता है। वहीं पार्टी नेतृत्व संभवतः जीत की संभावना, संगठनात्मक सक्रियता, सामाजिक समीकरण और मतदाताओं के बीच स्वीकार्यता जैसे कई पहलुओं को ध्यान में रखकर निर्णय लेगा।
फिलहाल ‘स्थानीय को टिकट’ बनाम ‘बाहरी या हाल में सक्रिय हुए दावेदार’ की चर्चा ने रिसाली निगम चुनाव से पहले राजनीतिक माहौल को गर्म कर दिया है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि टिकट वितरण के समय पार्टी किस चेहरे पर भरोसा जताती है और पुराने कार्यकर्ताओं की नाराजगी की चर्चाओं को किस तरह संभालती है।







