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पेपर लीक और प्रोफेसर की गिरफ्तारी के बाद भारती कालेज की पूरी व्यवस्था पर उठे सवाल, सिर्फ एक व्यक्ति पर कार्रवाई से जांच पूरी होगी या बड़े नेटवर्क का खुलेगा राज?

 

11 हजार का पेपर लीक या व्यवस्था में बड़ा छेद?

दुर्ग/पुलगांव @ गुलाब । इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय से संबद्ध कृषि महाविद्यालय की परीक्षा का प्रश्नपत्र सीलबंद लिफाफे में छेद कर एंडोस्कोपिक कैमरे से रिकॉर्ड करने और महज 11 हजार रुपए में छात्रों तक पहुंचाने के मामले ने शिक्षा व्यवस्था की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पुलिस ने शिकायत के करीब 36 घंटे के भीतर दुर्ग स्थित भारती एग्रीकल्चर कॉलेज के प्रोफेसर योगेश सोनकेसरिया समेत छह आरोपियों को गिरफ्तार किया है। पुलिस के अनुसार प्रश्नपत्र की रिकॉर्डिंग कर उसकी सामग्री छात्रों को दी गई और बाद में वह अन्य छात्रों तक पहुंची। मामले में दो अन्य आरोपियों की तलाश की बात भी सामने आई है।

 

लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह केवल एक प्रोफेसर और कुछ छात्रों का मामला है, या परीक्षा प्रश्नपत्र की सुरक्षा व्यवस्था में इससे कहीं बड़ा छेद मौजूद था?

11 हजार के लिए कोई प्रोफेसर अपनी नौकरी और भविष्य क्यों दांव पर लगाएगा?

सबसे चौंकाने वाला पहलू खुद सौदे की रकम है—सिर्फ 11 हजार रुपए।

एक प्रोफेसर, जो वर्षों से कॉलेज में कार्यरत बताया जा रहा है, आखिर इतनी छोटी रकम के लिए अपनी नौकरी, प्रतिष्ठा और भविष्य को जोखिम में डालने के लिए क्यों तैयार हुआ? यह सवाल पुलिस की जांच के दायरे में होना चाहिए।

जांच का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी होना चाहिए कि संबंधित प्रोफेसर को कॉलेज से कितना वेतन मिलता था, उसकी सेवा शर्तें क्या थीं, संस्थान में शिक्षकों और कर्मचारियों का वेतनमान क्या है तथा क्या सभी कर्मचारियों को नियमानुसार भुगतान किया जा रहा है?

सवाल सिर्फ पेपर लीक का नहीं, पेपर की सुरक्षा का भी

पुलिस के अनुसार प्रश्नपत्र सीलबंद पैकेट में था और उसे खोलकर दोबारा सील किए जाने जैसी प्रक्रिया सामने आई है। एक अन्य रिपोर्ट में 6 अगस्त को प्लांट पैथोलॉजी के प्रश्नपत्र को भी कथित रूप से इसी तरह निकालकर रिकॉर्ड करने और करीब 10 हजार रुपए में छात्रों तक पहुंचाने के आरोप में दूसरी एफआईआर की जानकारी सामने आई है।

अगर दोनों मामलों की जांच एक ही व्यक्ति तक पहुंचती है तो यह सवाल और गंभीर हो जाता है कि प्रश्नपत्र स्ट्रांग रूम से बाहर कैसे निकला, किसकी अनुमति से निकला, उसकी निगरानी किसके जिम्मे थी और वापस जमा होने तक उसकी सुरक्षा कौन सुनिश्चित कर रहा था?

पुलगांव चौक के पास से शुरू हुआ सफर, आज विश्वविद्यालय तक विस्तार

पुलगांव चौक के पास स्थित इस शैक्षणिक समूह का विस्तार पिछले वर्षों में कृषि शिक्षा से आगे इंजीनियरिंग, डिप्लोमा और अन्य उच्च शिक्षा पाठ्यक्रमों तक हुआ है। वर्तमान में भारती कॉलेज अब भारती विश्वविद्यालय, दुर्ग निजी विश्वविद्यालय के रूप में अस्तित्व में है और विश्वविद्यालय स्वयं भी छत्तीसगढ़ निजी विश्वविद्यालय अधिनियम के प्रावधानों के तहत अपनी शैक्षणिक परिषद के गठन का उल्लेख करता है। ऐसे में उन परीक्षाओं में क्या होता होगा जिसमें विश्वविद्यालय खुद आयोजित करती होगी। यह भी खबर है कि यह विश्वविद्यालय पैसे लेकर डिग्री भी देती है जो जांच का विषय है जिसकी कोई पुष्टि हम नहीं करते हैं।

ऐसे में सवाल यह है कि संस्थान जितना बड़ा हुआ, क्या उसके साथ प्रशासनिक और अकादमिक निगरानी की व्यवस्था भी उसी अनुपात में मजबूत हुई?

2012 का मामला भी फिर चर्चा में

इस संस्थान के प्रबंधन से जुड़े पुराने विवादों को लेकर भी अब सवाल उठने लगे हैं। वर्ष 2012 में इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट में सीबीआई द्वारा भारती इंजीनियरिंग कॉलेज के चेयरमैन सुशील चंद्राकर समेत अन्य लोगों की गिरफ्तारी का उल्लेख किया गया था। रिपोर्ट के अनुसार एक एआईसीटीई निरीक्षण दल से जुड़े कथित रिश्वत मामले में 12 लाख रुपए और सोने के 12 सिक्के बरामद किए गए थे।

यह पुराना मामला वर्तमान पेपर लीक प्रकरण से सीधे जुड़ा हुआ है, ऐसा कहना उचित नहीं होगा। लेकिन एक ही शैक्षणिक समूह से जुड़े पुराने विवादों की पृष्ठभूमि में वर्तमान घटना सामने आने के बाद नियामक संस्थाओं द्वारा व्यापक संस्थागत ऑडिट की मांग जरूर उठती है।

कर्मचारियों की सेवा शर्तें और वेतन भी जांच के दायरे में आएं

अब जांच केवल आरोपी प्रोफेसर तक सीमित रखने के बजाय संस्थान में कार्यरत शिक्षकों और कर्मचारियों की सेवा शर्तों की भी समीक्षा की मांग उठ रही है।

क्या सभी कर्मचारियों को नियमानुसार वेतन मिलता है?

क्या नियुक्तियां पारदर्शी तरीके से होती हैं?

क्या पीएफ और ईएसआई की राशि समय पर जमा होती है?

क्या शिक्षकों की योग्यता, नियुक्ति और पदस्थापना विश्वविद्यालय तथा संबंधित नियामक संस्थाओं के मानकों के अनुरूप है?

इन सवालों के जवाब दस्तावेजों की जांच से ही सामने आ सकते हैं।

भर्ती में ‘जुगाड़’ और पैसे के आरोपों की भी हो जांच

स्थानीय स्तर पर इस संस्थान में कृषि कॉलेज में छात्रों की जैक और जुगाड़ से भर्ती को लेकर को लेकर समय-समय पर तरह-तरह की चर्चाएं और आरोप सामने आते रहे हैं। यदि ऐसे आरोप शिकायतों, दस्तावेजों या जांच रिकॉर्ड में मौजूद हैं तो सरकार को उनकी भी स्वतंत्र जांच करानी चाहिए।

किस संकाय / ब्रांच में पर कितनी भर्ती हुई, कितने उम्मीदवारों ने आवेदन किया, चयन समिति में कौन था और चयन का आधार क्या रहा—इन सभी रिकॉर्ड की जांच की जा सकती है।

अगर सब कुछ नियमों के मुताबिक है तो जांच के बाद संस्थान को भी क्लीन चिट मिल सकती है। लेकिन यदि कहीं आर्थिक लेनदेन या नियमों की अनदेखी सामने आती है तो वर्तमान पेपर लीक मामले की पृष्ठभूमि में यह जांच और महत्वपूर्ण हो जाएगी।

डोनेशन से मेडिकल सीट भरने के आरोप कितने सच?

संस्थान के विभिन्न पाठ्यक्रमों में प्रवेश को लेकर भी तरह-तरह के आरोप और चर्चाएं सामने आती रही हैं। BAMS जैसी मेडिकल शिक्षा में कथित डोनेशन अथवा अनियमित प्रवेश के आरोपों की भी जांच की मांग उठ रही है।

हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। इसलिए सरकार और संबंधित नियामक संस्था को प्रवेश रिकॉर्ड, फीस स्ट्रक्चर, बैंक लेनदेन और विद्यार्थियों के प्रवेश की प्रक्रिया की जांच करनी चाहिए।

सबसे बड़ा सवाल—क्या सिर्फ प्रोफेसर ही जिम्मेदार है?

पेपर लीक होने के बाद प्रोफेसर और छात्रों की गिरफ्तारी निश्चित रूप से महत्वपूर्ण कार्रवाई है। पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए 36 घंटे के भीतर छह आरोपियों को पकड़ा है।

लेकिन प्रश्नपत्र स्ट्रांग रूम तक पहुंचा, वहां से बाहर निकला, सुरक्षित पैकेट किसी व्यक्ति के कब्जे में गया और फिर उसकी रिकॉर्डिंग हुई—इन सभी चरणों की जिम्मेदारी तय किए बिना जांच अधूरी मानी जाएगी।

जांच में यह भी सामने आना चाहिए कि प्रश्नपत्रों की जिम्मेदारी किन अधिकारियों और कर्मचारियों के पास थी, स्ट्रांग रूम की चाबी किसके पास थी, प्रवेश-निकास का रिकॉर्ड क्या था, सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध है या नहीं और प्रश्नपत्रों के वितरण की पूरी चेन क्या थी।

कुलसचिव से लेकर निचले स्तर तक जांच की जरूरत

अब जरूरत है कि मामले की जांच केवल गिरफ्तार किए गए छह लोगों तक सीमित न रहे।

प्रबंधन, कुलसचिव, परीक्षा शाखा, संबंधित कॉलेज प्रशासन, प्रश्नपत्रों की सुरक्षा से जुड़े अधिकारी-कर्मचारी और प्रश्नपत्रों के परिवहन एवं वितरण की पूरी प्रक्रिया की जांच होनी चाहिए।

साथ ही यह भी देखा जाना चाहिए कि कहीं इससे पहले किसी अन्य परीक्षा के प्रश्नपत्र के साथ ऐसी कोई घटना तो नहीं हुई।

11 हजार की कहानी कहीं बड़े खेल की शुरुआत तो नहीं?

सबसे बड़ा सवाल यही है।

क्या 11 हजार रुपए में बिके 15 सवाल केवल एक प्रोफेसर की लालच की कहानी है, या यह उस व्यवस्था की कमजोरी का संकेत है जिसमें प्रश्नपत्र सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी कई हाथों से होकर गुजरती है?

अगर जांच सिर्फ आरोपी प्रोफेसर और छात्रों की गिरफ्तारी के साथ समाप्त हो गई तो कई सवाल अनुत्तरित रह जाएंगे।

लेकिन यदि सरकार पूरे संस्थान की प्रशासनिक, वित्तीय, अकादमिक, भर्ती, कर्मचारी सेवा शर्तों और परीक्षा प्रणाली की स्वतंत्र एवं गहन जांच कराती है, तभी यह पता चल सकेगा कि मामला वास्तव में कितना बड़ा है।

क्योंकि सवाल सिर्फ 11 हजार रुपए का नहीं है—सवाल हजारों विद्यार्थियों के भविष्य, परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता और उस पूरी प्रणाली की जवाबदेही का है, जिस पर छात्र और अभिभावक भरोसा करते हैं।

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Author: Dhaara News

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