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दुर्ग जिले का चर्चित पंचायत सचिव पढ़े ये खबर

 

आबादी भूमि से लेकर 15वें वित्त तक, आरोपों की लंबी फेहरिस्त; ग्रामीणों में बढ़ी चिंता

दुर्ग। जिले की एक ग्राम पंचायत में पदस्थ रहे एक चर्चित पंचायत सचिव को लेकर ग्रामीणों के बीच गंभीर चर्चाएं और आरोप लगातार सामने आ रहे हैं। गांव के लोगों का कहना है कि सचिव ने अपने कार्यकाल के दौरान कथित रूप से आबादी भूमि का मनमाना बंटवारा कर कुछ चहेते लोगों को कब्जा दिलवा दिया, लेकिन वर्षों बाद भी संबंधित हितग्राहियों को वैधानिक पट्टा नहीं मिल सका।

ग्रामीणों का आरोप है कि अब सचिव के करीबी लोगों और स्थानीय स्तर पर सक्रिय कुछ कथित दलालों के माध्यम से प्रभावित परिवारों को भरोसा दिलाया जा रहा है कि उनके पट्टे जल्द बन जाएंगे। जबकि कई मामलों में आवश्यक दस्तावेज और अभिलेख ही उपलब्ध नहीं होने की चर्चा है। ऐसे में लाभार्थियों के सामने भविष्य को लेकर अनिश्चितता और भय का माहौल बना हुआ है।

आबादी मिली, पट्टा नहीं… अब घर पर संकट का डर

गांव के कई परिवारों का कहना है कि जिस जमीन पर उन्हें बसाया गया, उसका वैधानिक स्वामित्व आज तक नहीं मिल पाया। परिणामस्वरूप वे वर्षों से सरकारी कार्यालयों के चक्कर काट रहे हैं। कुछ लोग कथित रूप से बिचौलियों के संपर्क में भी हैं, जो पट्टा दिलाने के नाम पर आश्वासन दे रहे हैं।

ग्रामीणों के बीच अब यह सवाल उठ रहा है कि यदि जमीन आबंटन की प्रक्रिया विधिसम्मत थी तो आज तक पट्टे क्यों नहीं बने? और यदि प्रक्रिया में खामियां थीं, तो उसका जिम्मेदार कौन है?

 रेत, बोरखनन, शौचालय और वित्त आयोग की राशि पर भी सवाल

ग्रामीणों द्वारा लगाए जा रहे आरोपों के अनुसार संबंधित सचिव के कार्यकाल में रेत उत्खनन, बोरखनन कार्य, शौचालय निर्माण तथा 14वें एवं 15वें वित्त आयोग की राशि के उपयोग को लेकर भी कई सवाल उठे थे। आरोप है कि विभिन्न विकास कार्यों में अनियमितताओं और फर्जी बिलों के जरिए बड़े पैमाने पर बंदरबांट किया गया।

हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है, लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि संबंधित मामलों की निष्पक्ष जांच होने पर कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं।

 एक पंचायत से दूसरी पंचायत, लेकिन आरोप पीछा नहीं छोड़ रहे

ग्रामीणों का दावा है कि सचिव जहां-जहां पदस्थ रहा, वहां-वहां विवाद और शिकायतें सामने आती रहीं। आरोप है कि प्रभावशाली संपर्कों और कथित सेटिंग के बल पर वह हर बार कार्रवाई से बच निकलता है। इतना ही नहीं, उसके रहन-सहन और बढ़ती संपत्तियों को लेकर भी गांव में चर्चाओं का बाजार गर्म है।

असली नुकसान किसका?

सबसे बड़ा नुकसान उन गरीब और भोले-भाले ग्रामीणों का बताया जा रहा है, जिन्होंने सरकारी व्यवस्था पर भरोसा कर आबादी भूमि पर घर बना लिए। अब वही परिवार आशंकित हैं कि यदि भविष्य में दस्तावेजी जांच हुई तो उनके आशियाने पर संकट खड़ा हो सकता है।

ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों तक उन्हें यह समझ ही नहीं आया कि उनकी परेशानी की जड़ कौन है। अब जब दस्तावेजी स्थिति स्पष्ट नहीं हो पा रही है, तब कई लोग स्वयं को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।

अगले खुलासे में…

यह मामला केवल आबादी भूमि तक सीमित नहीं बताया जा रहा है। ग्रामीणों का दावा है कि संबंधित सचिव के कार्यकाल से जुड़े कई और तथ्य, वित्तीय लेन-देन और कथित अनियमितताओं की परतें अभी खुलना बाकी हैं।

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Author: Dhaara News

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