दुर्ग ग्रामीण:
कहते हैं सियासत में ‘पावर’ का नशा, भट्ठी की ‘देसी’ से भी तेज होता है। दुर्ग ग्रामीण के एक शराब दुकान में हाल ही में कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला, जहां एक छोटे से कर्मचारी के फोन के ‘साइलेंट मोड’ ने एक बड़े नेताजी के ‘इगो मोड’ को ऑन कर दिया।
किस्सा क्या है?
हुआ यूं कि नेताजी को अचानक ‘देसी’ की तलब जागी (शायद जनता की सेवा करते-करते थक गए थे)। उन्होंने भट्ठी के कर्मचारी को फोन घुमाया। अब बेचारा कर्मचारी अपने बड़े साहब के साथ मीटिंग में था, तो उसने अनुशासन दिखाते हुए फोन ‘साइलेंट’ कर दिया। नेताजी को क्या पता था कि उनका रसूख एक वाइब्रेशन पर टिका है! फोन नहीं उठा, तो नेताजी का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया। उन्हें लगा— “हमारी कॉल नहीं उठाई? विधायक जी के खास आदमी को इग्नोर किया?”
हुआ यूं कि नेताजी को अचानक ‘देसी’ की तलब जागी (शायद जनता की सेवा करते-करते थक गए थे)। उन्होंने भट्ठी के कर्मचारी को फोन घुमाया। अब बेचारा कर्मचारी अपने बड़े साहब के साथ मीटिंग में था, तो उसने अनुशासन दिखाते हुए फोन ‘साइलेंट’ कर दिया। नेताजी को क्या पता था कि उनका रसूख एक वाइब्रेशन पर टिका है! फोन नहीं उठा, तो नेताजी का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया। उन्हें लगा— “हमारी कॉल नहीं उठाई? विधायक जी के खास आदमी को इग्नोर किया?”
विधायक की धौंस और ‘सुपरफास्ट’ ट्रांसफर
फिर क्या था, नेताजी ने अपनी ‘विधायक वाली धौंस’ की फाइल निकाली और आनन-फानन में कर्मचारी का बोरिया-बिस्तर बंधवाकर उसे दूसरी जगह ट्रांसफर करवा दिया। कर्मचारी को समझ नहीं आया कि उसने गुनाह क्या किया है—साहब की बात मानना या नेताजी की प्यास न बुझाना?
फिर क्या था, नेताजी ने अपनी ‘विधायक वाली धौंस’ की फाइल निकाली और आनन-फानन में कर्मचारी का बोरिया-बिस्तर बंधवाकर उसे दूसरी जगह ट्रांसफर करवा दिया। कर्मचारी को समझ नहीं आया कि उसने गुनाह क्या किया है—साहब की बात मानना या नेताजी की प्यास न बुझाना?
जब ‘सियासी गुरू’ ने पलटा पासा
लेकिन कहानी में ट्विस्ट अभी बाकी था। कर्मचारी भी कच्चा खिलाड़ी नहीं था। उसने सीधे एक ऐसे बीजेपी नेता को फोन लगाया, जिनका रसूख विधायक और सांसद, दोनों के दरबार में ‘सुपर वीआईपी’ वाला है। जैसे ही कर्मचारी ने अपना दुखड़ा सुनाया, दिल्ली से लेकर दुर्ग तक के तार जुड़ गए। नतीजा? कुछ ही घंटों में ट्रांसफर का आदेश वैसे ही वापस ले लिया गया, जैसे चुनाव के बाद वादे वापस ले लिए जाते हैं। कर्मचारी फिर से उसी भट्ठी पर तैनात!
लेकिन कहानी में ट्विस्ट अभी बाकी था। कर्मचारी भी कच्चा खिलाड़ी नहीं था। उसने सीधे एक ऐसे बीजेपी नेता को फोन लगाया, जिनका रसूख विधायक और सांसद, दोनों के दरबार में ‘सुपर वीआईपी’ वाला है। जैसे ही कर्मचारी ने अपना दुखड़ा सुनाया, दिल्ली से लेकर दुर्ग तक के तार जुड़ गए। नतीजा? कुछ ही घंटों में ट्रांसफर का आदेश वैसे ही वापस ले लिया गया, जैसे चुनाव के बाद वादे वापस ले लिए जाते हैं। कर्मचारी फिर से उसी भट्ठी पर तैनात!
नेताजी की किरकिरी: ‘औकात’ का असली आईना
जब नेताजी को पता चला कि जिसे उन्होंने ‘उखाड़’ फेंका था, वह फिर से वहीं आकर डट गया है, तो उनकी हालत ‘बिन पानी की देसी’ जैसी हो गई। जो विधायक की धौंस दिखाकर रौब झाड़ रहे थे, उन्हें अपनी असली ‘वजन’ का अहसास हो गया। जनता के बीच अब चर्चा है कि नेताजी ने जबरन अपनी फजीहत करा ली।
जब नेताजी को पता चला कि जिसे उन्होंने ‘उखाड़’ फेंका था, वह फिर से वहीं आकर डट गया है, तो उनकी हालत ‘बिन पानी की देसी’ जैसी हो गई। जो विधायक की धौंस दिखाकर रौब झाड़ रहे थे, उन्हें अपनी असली ‘वजन’ का अहसास हो गया। जनता के बीच अब चर्चा है कि नेताजी ने जबरन अपनी फजीहत करा ली।
व्यंग्य बाण:
इस पूरे खेल में कर्मचारी की कोई गलती नहीं थी, उसने तो बस फोन साइलेंट किया था। लेकिन नेताजी को समझ आ गया कि राजनीति में हर बार ‘ट्रांसफर का डंडा’ नहीं चलता, कभी-कभी सामने वाला ‘डबल इंजन’ की सरकार वाला जुगाड़ भी रखता है।
इस पूरे खेल में कर्मचारी की कोई गलती नहीं थी, उसने तो बस फोन साइलेंट किया था। लेकिन नेताजी को समझ आ गया कि राजनीति में हर बार ‘ट्रांसफर का डंडा’ नहीं चलता, कभी-कभी सामने वाला ‘डबल इंजन’ की सरकार वाला जुगाड़ भी रखता है।
खैर, नेताजी अब शायद दोबारा फोन करने से पहले सोचेंगे कि कहीं कर्मचारी फिर से ‘साहब’ के साथ तो नहीं बैठा है!







