
दुर्ग जिला पंचायत में ग्राम पंचायत अंजोरा (ख) के जिला पंचायत संसाधन केंद्र (DPRC) भवन से जुड़े 14 लाख रुपये के कार्य में गंभीर अनियमितताओं और कथित भ्रष्टाचार का मामला लगातार उजागर हो रहा है। नियमों को पूरी तरह दरकिनार कर जिला पंचायत ने मनमानी प्रशासकीय स्वीकृति जारी की और जनपद पंचायत को बाइपास करते हुए सीधे ग्राम पंचायत के खाते में पैसा डाल दिया, जबकि ग्राम पंचायत स्तर पर कोई प्रस्ताव पारित नहीं हुआ था।
प्रमुख समाचार पत्र दैनिक भास्कर में छपी खबर के मुताबिक और हमारे द्वारा किए गए पड़ताल में इस गंभीर भ्रष्टाचार मे ये लापरवाही सामने आई है
ग्राम पंचायत में प्रस्ताव की अनुपस्थिति: छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम, 1993 के प्रावधानों के अनुसार, ऐसे विकास कार्यों के लिए ग्राम पंचायत स्तर पर प्रस्ताव पारित करना अनिवार्य है। लेकिन इस मामले में ग्राम पंचायत में कोई प्रस्ताव पारित नहीं हुआ था। जब कार्य पहले से ही शुरू हो चुका था, तब ग्राम सभा में बैक डेट या बाद में इस कार्य का प्रस्ताव पारित करवाया गया। यह प्रक्रिया पूरी तरह गैर-कानूनी है, क्योंकि कार्य शुरू होने से पहले ही ग्राम स्तर पर मंजूरी आवश्यक होती है।
जनपद पंचायत को बाइपास : जनपद पंचायत की मंजूरी और समन्वय के बिना जिला पंचायत ने सीधे ग्राम पंचायत को प्रथम किस्त के रूप में 7 लाख रुपये जारी कर दिए (चेक क्रमांक 391182, दिनांक 29.09.2025)। यह प्रक्रिया वैधानिक नहीं है, क्योंकि जनपद पंचायत को ऐसे कार्यों में मध्यस्थ भूमिका निभानी होती है।
बिना एग्रीमेंट के कार्य आरंभ: सरपंच के स्तर पर कोई लिखित एग्रीमेंट नहीं किया गया, जबकि हर सरकारी कार्य में ठेकेदार/वेंडर के साथ एग्रीमेंट अनिवार्य होता है। इसके बावजूद रंग-रोगन, मरम्मत, फर्नीचर खरीद और अन्य सामग्री के लिए कार्य शुरू कर दिया गया।
बिना इंजीनियर के प्राक्कलन और सत्यापन का बड़ा सवाल: ग्रामीण यांत्रिकी सेवा विभाग के इंजीनियर द्वारा प्राक्कलन। तैयार करना, तकनीकी स्वीकृति प्रदान करना और कार्य का मूल्यांकन/सत्यापन करना अनिवार्य है। लेकिन इस कार्य के लिए कोई इंजीनियर नियुक्त ही नहीं किया गया। इससे कार्य का मूल्यांकन और सत्यापन फर्जी साबित होने की आशंका है, क्योंकि बिना उचित तकनीकी मूल्यांकन के राशि जारी करना और कार्य करवाना गंभीर उल्लंघन है। यह प्रश्न उठता है कि बिना प्राक्कलन के उक्त कार्य का मूल्यांकन और सत्यापन कौन करेगा?
शिकायतकर्ता टिकेश्वर देशमुख (ग्राम अंजोरा निवासी) ने इस पूरे प्रकरण को उजागर किया है। कुल स्वीकृत राशि 14 लाख में से 7 लाख पहले ही जारी हो चुकी है, जिसमें 2.10 लाख मजदूरी और 4.90 लाख सामग्री पर खर्च दिखाया गया, जबकि मजदूरों को अग्रिम (प्री-पेड) भुगतान किया गया. जिला पंचायत ने दूसरी किस्त (शेष 7 लाख) अभी तक जारी नहीं की है, जो बढ़ते दबाव या जांच का संकेत माना जा रहा है।
दुर्ग युवा कांग्रेस ने इस मामले को लेकर मुख्य सचिव छत्तीसगढ़ को शिकायत करने की तैयारी की है।
यह घटना दुर्ग ग्रामीण क्षेत्र में पहले के कई मामलों में ग्राम पंचायत दबाव से हो रही है, जहां सरपंचों पर धारा 40(ख) के तहत दबाव के आरोप लगते रहे हैं।
बीते शनिवार को प्रकाशित खबर के मुताबिक जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी बजरंग दुबे ने इस मामले पर कहा है कि सारे काम नियम से हुए हैं और आरोप बेबुनियाद हैं. वहीं पंचायत को 20 लाख रुपए तक के काम करने के अधिकार की बात कही है. और मामले को दो जनप्रतिनिधियों की आपसी खींचतान बताया है उन्होंने उच्च अधिकारियों को भी इस मामले की जानकारी होना बताया है.
परंतु प्रक्रिया पर ये सवाल खड़ा हो रहा है-
1. बिना जनपद पंचायत से एग्रीमेंट के क्या पंचायत के सरपंच 20 लाख तक के भी काम कर सकते हैं?
2. क्या बिना प्रस्ताव के 20 लाख रुपए तक के काम कर सकते है?
3. क्या बिना इंजीनियर के 20 लाख रुपए तक के काम को संपादित कर सकते हैं।
4. सवाल तो यहां पर यह है कि क्या बिना प्रस्ताव के भी सीधे सरपंच के खाते में पैसा डाला जा सकता है?
इन सवालों के जवाब मिलना अभी बांकी है।