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सीरीज 3: “धारा 40 का डर और पंचायतों की खामोशी: आखिर कौन चला रहा गांव की सरकार?

 

सरपंचों का दावा—कार्रवाई का भय, ठेकेदारों का दबाव और पंचायतों की स्वायत्तता पर बड़े सवाल।

विशेष रिपोर्ट

हमारी खोजी श्रृंखला के पहले भाग में पंचायतों में कथित राजनीतिक हस्तक्षेप और एजेंसी चयन पर सवाल उठाए गए थे। दूसरे भाग में विकास कार्यों की गुणवत्ता, कथित कमीशन तंत्र और भुगतान प्रक्रिया में अनौपचारिक हस्तक्षेप की चर्चा सामने आई। अब तीसरी कड़ी में सबसे गंभीर सवाल यह है कि आखिर निर्वाचित सरपंच और पंचायत प्रतिनिधि खुलकर बोल क्यों नहीं पा रहे हैं?

छत्तीसगढ़ पंचायती राज अधिनियम में धारा 40 का उद्देश्य उन सरपंचों और पंचायत पदाधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई करना है जो अपने कर्तव्यों में गंभीर लापरवाही या अनियमितता करते हैं। लेकिन कई पंचायत प्रतिनिधियों का दावा है कि इस प्रावधान का नाम लेकर ऐसा भय का वातावरण बन गया है कि अनेक सरपंच प्रशासनिक और राजनीतिक दबाव के खिलाफ खुलकर अपनी बात रखने से बचते हैं।

कई पंचायत प्रतिनिधियों का आरोप है कि यदि वे किसी कथित रूप से तय एजेंसी या बाहर से आए ठेकेदार के माध्यम से कार्य कराने से इंकार करते हैं, तो योजनाओं के क्रियान्वयन में बाधाएं आने लगती हैं। कुछ का यह भी दावा है कि पंचायत सचिवों तक फोन पहुंचाकर विशेष एजेंसियों के पक्ष में दबाव बनाया जाता है। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी होना बाकी है, लेकिन पंचायतों में इस प्रकार की चर्चाएं लगातार सुनाई देती हैं।

ग्रामीणों और पंचायत प्रतिनिधियों का कहना है कि आज स्थिति ऐसी बन गई है कि सरपंच गांव का निर्वाचित मुखिया होकर भी कई बार स्वयं को निर्णय लेने में असहाय महसूस करता है। पंचायत भवन में होने वाले निर्णयों से पहले ही कथित रूप से बाहरी स्तर पर दिशा तय होने की शिकायतें सामने आती हैं।

सबसे अधिक नुकसान विकास कार्यों की गुणवत्ता पर दिखाई दे रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि सामुदायिक भवन, सीसी रोड, नालियां और अन्य निर्माण कार्य कई स्थानों पर अपेक्षित गुणवत्ता के अनुरूप नहीं हैं। निर्माण पूरा होने के कुछ ही समय बाद दरारें, टूट-फूट और खराब सामग्री की शिकायतें सामने आने लगती हैं।

विडंबना यह है कि जनता सीधे सरपंच को जिम्मेदार मानती है। गांव में यदि सड़क टूटती है, नाली बह जाती है या भवन जर्जर दिखाई देता है तो आरोप सरपंच पर लगता है, जबकि कई पंचायत प्रतिनिधियों का कहना है कि उन्हें कार्यों के चयन और क्रियान्वयन में पूरी स्वतंत्रता नहीं मिलती।

ग्रामीणों का यह भी आरोप है कि जब कोई नागरिक, पंच या सरपंच घटिया निर्माण कार्यों पर सवाल उठाता है, तो उसे “विकास विरोधी” बताकर उसकी आवाज कमजोर करने की कोशिश की जाती है। शिकायतकर्ताओं को यह समझाया जाता है कि ऐसे सवालों से गांव का विकास रुक जाएगा। इससे गुणवत्ता पर निगरानी और जवाबदेही दोनों प्रभावित होती हैं।

कुछ पंचायत प्रतिनिधियों का कहना है कि गांवों में ऐसी धारणा बन रही है कि ऊपर तक सब कुछ पहले से तय है, इसलिए शिकायत करने से भी कोई विशेष परिणाम नहीं निकलता। इन दावों की पुष्टि निष्पक्ष जांच का विषय है, लेकिन यदि ऐसी स्थिति वास्तव में मौजूद है तो यह पंचायती राज व्यवस्था की मूल भावना पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है।

पंचायती राज व्यवस्था का आधार ग्राम सभा, पारदर्शिता और स्थानीय निर्णय प्रक्रिया है। यदि निर्वाचित प्रतिनिधि भय में रहें, सचिव दबाव महसूस करें, ग्रामीण शिकायत करने से बचें और गुणवत्ता पर सवाल उठाने वालों को ही कटघरे में खड़ा कर दिया जाए, तो स्थानीय स्वशासन की अवधारणा कमजोर पड़ सकती है।

अब सबसे बड़े सवाल

– क्या ग्राम सभा वास्तव में सर्वोच्च है या निर्णय कहीं और लिए जा रहे हैं?

– क्या सरपंच स्वतंत्र रूप से विकास कार्यों का निर्णय ले पा रहे हैं?

– क्या पंचायत सचिवों पर किसी प्रकार का बाहरी दबाव है?

– यदि गुणवत्ता खराब है तो जवाबदेही किसकी तय होगी?

– क्या धारा 40 केवल जवाबदेही का प्रावधान है या पंचायत प्रतिनिधियों के बीच भय का कारण भी बन गई है?

– क्या पंचायतों में कथित हस्तक्षेप और घटिया निर्माण की शिकायतों की उच्चस्तरीय, निष्पक्ष जांच होनी चाहिए?

समापन

यदि पंचायत प्रतिनिधियों और ग्रामीणों द्वारा लगाए जा रहे आरोप सही हैं, तो यह केवल कुछ पंचायतों का मामला नहीं बल्कि पंचायती राज व्यवस्था की विश्वसनीयता का प्रश्न है। वहीं यदि ये आरोप निराधार हैं, तो प्रशासन और संबंधित पक्षों को तथ्यों के साथ स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए ताकि जनता का विश्वास बना रहे।

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Author: Dhaara News

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