दुर्ग जिले की राजनीति में बढ़ती ‘दरबार संस्कृति’, अपने ही कार्यकर्ताओं में गहरा असंतोष
दुर्ग। दुर्ग जिले की राजनीति में इन दिनों एक विधायक और उनके बेहद प्रभावशाली निजी सहायक (PA) को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। पार्टी कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं के बीच यह आरोप तेजी से फैल रहा है कि विधायक के आसपास एक ऐसा “दरबार तंत्र” खड़ा हो गया है, जिसने संगठन के पुराने चेहरों, जमीनी कार्यकर्ताओं और यहां तक कि विधायक के करीबी पारिवारिक लोगों को भी उनसे दूर कर दिया है।
राजनीतिक गलियारों में अब खुलकर कहा जा रहा है कि विधायक “धृतराष्ट्र” की भूमिका में दिखाई दे रहे हैं, जबकि उनका PA “दुर्योधन” बनकर क्षेत्र में शक्ति केंद्र संचालित कर रहा है। कार्यकर्ताओं का आरोप है कि विधायक तक सीधी पहुंच लगभग समाप्त हो चुकी है और अधिकांश राजनीतिक फैसले सीमित लोगों के प्रभाव में लिए जा रहे हैं।
पहले PA से अनुमति, फिर विधायक से मुलाकात”
स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि:
विधायक से मिलने के लिए पहले PA की सहमति जरूरी हो गई है,
कार्यक्रम, सिफारिश, नियुक्ति और राजनीतिक बैठकों में वही अंतिम निर्णयकर्ता बन चुका है,
पुराने कार्यकर्ताओं और समर्पित नेताओं को धीरे-धीरे किनारे किया जा रहा है।
कुछ कार्यकर्ताओं का कहना है:
“क्षेत्र में अब जनता की नहीं, दरबार की राजनीति चल रही है।”
घर के लोग भी हो गए दूर?”
सबसे चौंकाने वाली चर्चा यह है कि विधायक के बेहद करीबी और पारिवारिक लोग जिन्होंने चुनाव जिताने मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई भी अब उनसे दूरी महसूस कर रहे हैं। राजनीतिक हलकों में कहा जा रहा है कि:
विधायक के पुराने विश्वस्त लोग अब सक्रिय नहीं दिखते,
परिवार और संगठन के बीच संवाद कमजोर हुआ है,
निजी सलाहकारों का दखल लगातार बढ़ गया है।
एक स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ता ने टिप्पणी की:
“जो लोग वर्षों से विधायक के साथ खड़े थे, आज वही सबसे ज्यादा उपेक्षित हैं।”
विपक्ष को साधने में अपने ही नाराज़?
क्षेत्र में यह भी चर्चा है कि विधायक विपक्षी चेहरों और दूसरे राजनीतिक गुटों को साधने में ज्यादा सक्रिय हैं। इसी कारण मूल कार्यकर्ताओं में गहरी नाराज़गी पनप रही है।
सूत्रों के अनुसार:
विपक्ष से आए चेहरों को प्राथमिकता मिल रही है,
बूथ स्तर के पुराने कार्यकर्ता खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं,
संगठन में “अपनों की अनदेखी” बड़ा मुद्दा बन चुका है।
जनपद सदस्य वाला मामला बना चर्चा का केंद्र
अंदरखाने सबसे ज्यादा चर्चा एक जनपद सदस्य को लेकर है। आरोप है कि उन्हें साफ शब्दों में कहा गया:
“विधायक जी ने बोला है कि आपको कोई काम नहीं देना है।”
इसके बाद क्षेत्र में यह चर्चा फैल गई कि संबंधित जनपद सदस्य अब केवल राशन कार्ड और छोटे स्थानीय कार्यों तक सीमित होकर रह गए हैं। इस घटनाक्रम ने कार्यकर्ताओं के बीच और ज्यादा असंतोष पैदा कर दिया है।
“वोट बैंक का चीरहरण” वाली चर्चा क्यों?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब किसी जनप्रतिनिधि के आसपास सीमित लोगों का प्रभाव अत्यधिक बढ़ जाता है, तब संगठन की जड़ें कमजोर होने लगती हैं। दुर्ग जिले में भी अब यही सवाल उठने लगे हैं कि क्या निजी सलाहकारों और सीमित राजनीतिक घेरे ने पार्टी के पारंपरिक वोट बैंक को नुकसान पहुंचाना शुरू कर दिया है?
कार्यकर्ताओं के बीच अब “वोट बैंक का चीरहरण” जैसी तीखी राजनीतिक उपमाएं सुनाई देने लगी हैं।
“अभी से निपटाने का प्लान?”
सूत्रों का दावा है कि नाराज़ कार्यकर्ताओं का एक वर्ग अब खुलकर विरोध के बजाय “मौन रणनीति” पर काम कर रहा है। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक यदि असंतोष नहीं थमा तो आने वाले चुनावों में इसका असर बूथ स्तर पर दिख सकता है।
उठ रहे बड़े सवाल!!!
क्या विधायक संगठन और परिवार दोनों से दूर होते जा रहे हैं?
क्या क्षेत्र में समानांतर सत्ता केंद्र बन चुका है?
क्या निजी सलाहकारों का प्रभाव संगठन पर भारी पड़ रहा है?
क्या पुराने कार्यकर्ताओं की अनदेखी चुनावी नुकसान का कारण बनेगी?








