क्या गांवों को स्मार्ट बनाने के नाम पर उन्हें कंक्रीट का जंगल बना दिया गया है?
@Gulab ।बरसात की कुछ ही घंटे की बारिश… और गांवों की गलियां तालाब बन गईं। नालियां उफान पर हैं, घरों के सामने गंदा पानी जमा है, सड़ांध उठ रही है, मच्छरों का झुंड हर शाम लोगों पर हमला बोल रहा है। यह दृश्य किसी एक गांव का नहीं, बल्कि देश के हजारों गांवों की नई तस्वीर बनता जा रहा है।
सवाल है—क्या यह प्राकृतिक आपदा है, या हमारी विकास नीति की विफलता?
कभी यही बरसात गांवों के लिए जीवन लेकर आती थी। वर्षा का पानी खेतों में समाता था, तालाब भरते थे, कुएं लबालब रहते थे और भूजल का स्तर बढ़ता था। आज वही पानी गांवों में बाढ़ जैसा संकट पैदा कर रहा है।
कारण साफ दिखाई देता है।
गांवों की मिट्टी पर चारों ओर सीसी रोड, सीमेंट के आंगन और कंक्रीट की मोटी परत बिछा दी गई। धरती का सीना बंद कर दिया गया। अब बारिश का पानी जमीन में उतर ही नहीं सकता। वह तेज़ी से बहकर नालियों में पहुंचता है, और जहां नालियां छोटी, जाम या गंदगी से भरी हैं, वहां जलभराव होना तय है।
विडंबना देखिए—यही गांव गर्मियों में पानी के लिए तरसते हैं। हैंडपंप सूख जाते हैं, बोरवेल जवाब देने लगते हैं और भूजल लगातार नीचे चला जाता है। यानी बरसात में बाढ़ और गर्मियों में सूखा—क्या यही विकास का मॉडल है?
स्वच्छता के नाम पर हजारों शौचालय बने, लेकिन अनेक स्थानों पर सुरक्षित सेप्टिक टैंक, सोख्ता और वैज्ञानिक अपशिष्ट प्रबंधन पर उतना ध्यान नहीं दिया गया। नतीजा यह है कि गंदा पानी नालियों में बहता है, नालियां बजबजाती हैं, दुर्गंध फैलती है और मच्छरों के लिए स्थायी प्रजनन स्थल बन जाते हैं।
एक और दुखद बदलाव चुपचाप हुआ—गांवों का घूरवा गायब हो गया।
जहां कभी गोबर, राख, मिट्टी, पत्तियां और घर का जैविक कचरा खाद बनकर खेतों में लौटता था, वहां आज प्लास्टिक, पॉलीथिन और सड़ता हुआ कचरा पड़ा है। प्लास्टिक ने नालियों को जाम किया, जल निकासी रोकी और गांवों के प्राकृतिक पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंचाया।
यह केवल स्वच्छता का प्रश्न नहीं है। यह भूजल, खेती, पशुधन, पर्यावरण और जनस्वास्थ्य का प्रश्न है।
देश की पर्यावरणीय न्याय व्यवस्था भी अंधाधुंध कंक्रीटीकरण पर चिंता जता चुकी है। National Green Tribunal (NGT) ने विभिन्न मामलों में कहा है कि बिना वैज्ञानिक योजना के अत्यधिक कंक्रीटीकरण भूजल पुनर्भरण को प्रभावित करता है, जलभराव बढ़ाता है और प्राकृतिक जल निकासी व्यवस्था को नुकसान पहुंचा सकता है। ट्रिब्यूनल ने जहां संभव हो, वर्षा जल को जमीन में पहुंचाने वाली जल-पारगम्य (Permeable) संरचनाओं को बढ़ावा देने की आवश्यकता भी रेखांकित की है।
आज आवश्यकता किसी राजनीतिक बहस की नहीं, बल्कि आत्ममंथन की है।
क्या गांवों का विकास प्रकृति को मिटाकर होगा, या प्रकृति के साथ मिलकर?
अब समय आ गया है कि “कंक्रीट हटाओ – गांव बचाओ” जैसा जन अभियान शुरू हो।
– गांवों में अंधाधुंध कंक्रीटीकरण की समीक्षा हो।
– वर्षा जल संचयन और भूजल रिचार्ज हर निर्माण का अनिवार्य हिस्सा बने।
– घूरवा जैसी पारंपरिक प्रणालियों को पुनर्जीवित किया जाए।
– नालियों की नियमित सफाई और प्लास्टिक कचरे पर प्रभावी नियंत्रण हो।
– हर शौचालय के साथ सुरक्षित और वैज्ञानिक अपशिष्ट प्रबंधन सुनिश्चित किया जाए।
– गांवों की योजना स्थानीय मिट्टी, जल निकासी और पर्यावरण को ध्यान में रखकर बनाई जाए।
बरसात हर साल हमें चेतावनी देती है। प्रश्न यह है कि क्या हम इस चेतावनी को सुनेंगे, या अगली बारिश में फिर उसी जलभराव, बदबू, मच्छरों और जल संकट को विकास का नाम देकर स्वीकार कर लेंगे?
गांव केवल सीमेंट से नहीं बनते। गांव पानी, मिट्टी, पेड़, तालाब, स्वच्छता और प्रकृति के संतुलन से जीवित रहते हैं। यदि यह संतुलन टूट गया, तो सबसे बड़ा नुकसान गांवों का ही होगा।








