लिस्टोमेनिया पब, महादेव सट्टा, ओयो होटल, अवैध प्लॉटिंग और अब बीएसपी में लोहा चोरी—हर बार विरोध, लेकिन क्या बदला? जनता पूछ रही है कई असहज सवाल।
देश के सबसे बड़े औद्योगिक शहरों में गिने जाने वाले भिलाई में इन दिनों एक बार फिर वैशाली नगर विधायक रिकेश सेन की सक्रियता चर्चा का विषय बनी हुई है। इस बार मुद्दा है भिलाई इस्पात संयंत्र से कथित लोहा चोरी का, जिसे लेकर विधायक लगातार सोशल मीडिया, वीडियो संदेशों और सार्वजनिक मंचों पर मुखर दिखाई दे रहे हैं तथा केंद्रीय जांच एजेंसी से जांच की मांग कर रहे हैं।
लेकिन राजनीतिक गलियारों और आम लोगों के बीच चर्चा का केंद्र केवल लोहा चोरी नहीं, बल्कि विधायक की पिछली तमाम मुहिम भी बन गई है।
लोग याद दिला रहे हैं कि विधायक ने पहले लिस्टोमेनिया जैसे पबों का विरोध किया, महादेव सट्टा एप के खिलाफ आवाज उठाई, ओयो होटलों पर कार्रवाई की मांग की, कई होटलों के बंद होने की खबरें भी आईं। अवैध प्लॉटिंग और जमीन के कारोबार पर भी उन्होंने लगातार सवाल उठाए। लेकिन समय बीतने के साथ अधिकांश गतिविधियां फिर शुरू होती नजर आईं।
अब जनता पूछ रही है—यदि हर मुद्दे पर इतनी आक्रामक मुहिम चलती है, तो उसका स्थायी परिणाम आखिर क्यों नहीं दिखता?
भिलाई में यह भी चर्चा है कि विधायक पांच बार नगर निगम के पार्षद रह चुके हैं। ऐसे में विपक्षी और कुछ स्थानीय लोग सवाल उठा रहे हैं कि यदि बीएसपी से कथित रूप से दशकों से लोहा चोरी हो रही थी, तो इसकी जानकारी पहले क्यों नहीं आई? क्या व्यवस्था इतनी कमजोर थी या किसी ने इस पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया?
सोशल मीडिया और चौराहों पर तरह-तरह की चर्चाएं भी चल रही हैं। कुछ लोग बिना किसी प्रमाण के यह तक कह रहे हैं कि कहीं “हिस्सेदारी” को लेकर विवाद तो नहीं है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और इनके समर्थन में कोई सार्वजनिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। इसलिए इन्हें केवल क्षेत्र में चल रही चर्चाओं के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
एक और सवाल यह भी उठ रहा है कि यदि विधायक स्वयं सत्तारूढ़ दल के प्रभावशाली नेता हैं और विधानसभा में खुलकर अपनी बात रखने की स्थिति में हैं, तो फिर अधिकतर लड़ाई सोशल मीडिया वीडियो और प्रेस बयानों के माध्यम से ही क्यों लड़ी जा रही है? क्या सरकार के भीतर इस मुद्दे पर अपेक्षित समर्थन नहीं मिल रहा, या फिर यह जनदबाव बनाने की रणनीति है?
विधायक द्वारा कुछ पत्रकारों और अन्य लोगों पर भी सार्वजनिक रूप से सवाल उठाए गए हैं। ऐसे में यह बहस और तेज हो गई है कि क्या जांच पूरी होने से पहले किसी व्यक्ति या संस्था पर सार्वजनिक रूप से आरोप लगाना उचित है।
यदि वास्तव में पिछले लगभग 40 वर्षों में हजारों करोड़ रुपये मूल्य के लोहे की चोरी हुई है, जैसा कि विभिन्न मंचों पर दावा किया जा रहा है, तो यह केवल किसी एक अधिकारी या कर्मचारी का मामला नहीं बल्कि पूरे तंत्र की जवाबदेही का विषय बनता है। ऐसे गंभीर आरोपों की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच ही सच्चाई सामने ला सकती है।
अब सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यही है कि क्या यह मुहिम अंत तक पहुंचेगी या पहले की तरह कुछ समय बाद यह भी केवल सुर्खियों तक सीमित रह जाएगी? आने वाले चुनाव में मतदाता केवल आवाज नहीं, बल्कि परिणाम भी देखना चाहेंगे। यदि इस बार भी ठोस निष्कर्ष सामने नहीं आते, तो विपक्ष को विधायक की कार्यशैली पर सवाल उठाने का एक और बड़ा मुद्दा मिल सकता है।








