PA, PSO और कंप्यूटर ऑपरेटर से जुड़े लोगों को सहायता मिलने के आरोपों ने खड़े किए थे सवाल; निलंबन, पद से हटाने और जांच के नतीजे पर अब तक स्पष्ट सार्वजनिक जानकारी नहीं
धारा न्यूज़ | दुर्गछत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के विधानसभा क्षेत्र के भाजपा विधायक ईश्वर साहू के स्वेच्छानुदान वितरण से जुड़ा विवाद अगस्त 2025 में सुर्खियों में आया था। सोशल मीडिया पर प्रसारित एक कथित हितग्राही सूची के आधार पर विधायक के निजी सहायक (PA), निजी सुरक्षा अधिकारी (PSO) और कंप्यूटर ऑपरेटर से जुड़े रिश्तेदारों एवं परिचितों को सरकारी सहायता मिलने के आरोप लगाए गए थे। इस मामले में कांग्रेस ने सवाल उठाए थे, वहीं विधायक ईश्वर साहू ने आरोपों को राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित बताया था।
लेकिन इस पूरे प्रकरण में एक अहम सवाल आज भी सार्वजनिक चर्चा के केंद्र में है—क्या आरोपों के बाद संबंधित निज सहायकों या अन्य कर्मचारियों को पद से हटाया गया? क्या उनके विरुद्ध कोई विभागीय जांच हुई? और यदि जांच हुई, तो उसका परिणाम क्या निकला?
*आरोपों के केंद्र में थे निज सहायक और अन्य कर्मचारी*
1 अगस्त 2025 को IBC24, लल्लूराम, द सूत्र और तिरंदाज सहित कई समाचार माध्यमों ने इस मामले को प्रकाशित किया था। रिपोर्टों में विधायक के PA दिग्विजय केशरी और अनुज वर्मा, PSO ओम साहू तथा कंप्यूटर ऑपरेटर धीरज पटेल से जुड़े लोगों को स्वेच्छानुदान मिलने के आरोप सामने आए थे।
मीडिया में प्रकाशित विवरण के अनुसार, वायरल सूची में कुछ लोगों के नाम के साथ उनके कथित पारिवारिक संबंधों का उल्लेख किया गया था। कांग्रेस ने इसे सहायता राशि के वितरण में कथित पक्षपात का मामला बताते हुए सवाल उठाए और कार्रवाई की मांग की।
हालांकि, वायरल सूची में नाम होना अपने-आप में किसी कर्मचारी की अनियमितता या अपराध साबित नहीं करता। इसके लिए आधिकारिक स्वीकृति आदेश, भुगतान विवरण, हितग्राहियों की पात्रता और संबंधित कर्मचारियों की वास्तविक भूमिका की जांच जरूरी है।
*विधायक ने क्या कहा था?*
विवाद के दौरान विधायक ईश्वर साहू ने मीडिया से कहा था कि वे स्वेच्छानुदान के लिए लगभग दो हजार लोगों के नाम भेज चुके हैं और इनमें से करीब 500 से 700 लोगों को सहायता मिल चुकी है। उन्होंने कहा था कि आवेदन लेकर आने वाले लोगों के नाम उनकी समस्या के आधार पर भेजे गए और किसी की पार्टी या परिवार देखकर भेदभाव नहीं किया गया। उन्होंने कांग्रेस पर उनकी छवि खराब करने की कोशिश करने का आरोप भी लगाया था।
लेकिन स्वेच्छानुदान के लिए बड़ी संख्या में नाम भेजने का स्पष्टीकरण अपने-आप में उन विशिष्ट आरोपों का जवाब नहीं है, जिनमें निजी स्टाफ से जुड़े लोगों के रिश्तेदारों को सहायता मिलने की बात कही गई थी। इन आरोपों की पुष्टि या खंडन आधिकारिक रिकॉर्ड के परीक्षण से ही हो सकता है।
*सवाल सिर्फ अनुदान का नहीं, जवाबदेही का भी है*
यदि किसी विधायक के कार्यालय में काम करने वाले कर्मचारी के रिश्तेदारों को सरकारी सहायता मिलती है, तो केवल रिश्तेदारी के आधार पर उसे गलत नहीं माना जा सकता। लेकिन यदि आरोप है कि पद का इस्तेमाल करके अपात्र लोगों को लाभ दिलाया गया, तो संबंधित कर्मचारी की भूमिका और पूरी प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
इसीलिए इस मामले में यह जानना जरूरी है कि विधायक कार्यालय, जिला प्रशासन या संबंधित सरकारी विभाग ने क्या कदम उठाए। क्या हितग्राही सूची की जांच की गई? क्या कर्मचारियों से जवाब मांगा गया? क्या किसी को जिम्मेदारी से अलग किया गया? क्या जांच में कोई अनियमितता मिली?
*क्या निज सहायक अब भी विधायक के साथ हैं?*
उपलब्ध तथ्यों और मीडिया में मौजूद दस्तावेजों से और उपलब्ध रिकॉर्ड से या प्रमाणित होता है कि अभी भी विधायक के निज सहायक नहीं हटाए गए हैं इसलिए यह कहा जा सकता है कि विधायक की सहमति से ही यह सब अनुदान की राशि जारी की गई थी
*अन्य जनप्रतिनिधियों के मामलों से तुलना का सवाल*
राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में कई बार किसी जनप्रतिनिधि के निजी स्टाफ पर गंभीर आरोप लगने के बाद उसे पद से हटाने या जिम्मेदारी से अलग करने की मांग उठती रही है। ऐसे मामलों में कार्रवाई का निर्णय आरोपों की प्रकृति, उपलब्ध साक्ष्य और संबंधित नियमों पर निर्भर करता है।
साजा विधायक के मामले में भी यही कसौटी लागू होनी चाहिए। यदि संबंधित कर्मचारियों को नहीं हटाया गया जांच नहीं हुई और जांच हुई भी , तो किस अधिकारी ने की और क्या निष्कर्ष निकला? और यदि कोई कार्रवाई नहीं हुई, तो उसका कारण क्या है?
अब विधायक और प्रशासन से इन सवालों के जवाब जरूरी
1. क्या स्वेच्छानुदान विवाद के बाद PA दिग्विजय केशरी, अनुज वर्मा, PSO ओम साहू या कंप्यूटर ऑपरेटर धीरज पटेल के विरुद्ध कोई आधिकारिक शिकायत दर्ज हुई?
2. क्या संबंधित विभाग, जिला प्रशासन या विधायक कार्यालय ने जांच कराई? यदि हां, तो उसकी रिपोर्ट कहां है?
3. क्या किसी कर्मचारी को पद से हटाया गया, निलंबित किया गया या उसकी जिम्मेदारी बदली गई?
4. क्या कथित हितग्राहियों की सूची का सरकारी रिकॉर्ड से मिलान किया गया?
5. क्या विधायक कार्यालय इस संबंध में वर्तमान स्थिति स्पष्ट करेगा?








