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2014 से 2026 तक रसोई का बजट बिगड़ा: खाने के तेल ने निकाला आम आदमी का तेल, कोरोना के बाद महंगाई ने बढ़ाई मुश्किलें

 

नई दिल्ली। देश में महंगाई की सबसे बड़ी मार जिन जरूरी वस्तुओं पर पड़ी है, उनमें खाने का तेल प्रमुख है। वर्ष 2014 की तुलना में 2026 तक अधिकांश ब्रांडेड खाद्य तेलों की कीमतों में 70% से 150% तक की वृद्धि देखने को मिली। सबसे बड़ा झटका कोरोना महामारी (2020-22) के दौरान लगा, जब वैश्विक सप्लाई चेन टूटने, रूस-यूक्रेन युद्ध, पाम ऑयल उत्पादक देशों की निर्यात नीतियों और बढ़ती आयात लागत ने तेल के दाम रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचा दिए।

भारत पाम तेल पर इतना निर्भर क्यों?

भारत अपनी खाद्य तेल की कुल जरूरत का लगभग 56-57% आयात करता है। आयातित तेलों में करीब 59% हिस्सा पाम ऑयल का है, जो मुख्य रूप से इंडोनेशिया और मलेशिया से आता है। जब इन देशों में उत्पादन घटता है, निर्यात नीति बदलती है या अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ती हैं, तो उसका सीधा असर भारतीय रसोई पर पड़ता है।

कोरोना के बाद क्यों बढ़े दाम?

विशेषज्ञों के अनुसार कीमतों में उछाल के पीछे कई कारण रहे—

कोरोना के दौरान वैश्विक सप्लाई चेन बाधित हुई।

कंटेनर और समुद्री मालभाड़ा महंगा हुआ।

इंडोनेशिया ने कुछ समय के लिए पाम ऑयल निर्यात पर प्रतिबंध लगाए।

रूस-यूक्रेन युद्ध से सूरजमुखी तेल की आपूर्ति प्रभावित हुई।

वैश्विक स्तर पर पाम ऑयल की मांग और जैव ईंधन (बायोडीजल) नीतियों का असर पड़ा।

मिडिल क्लास की रसोई पर असर

2014 में जो परिवार हर महीने 5 लीटर तेल ₹350-450 में खरीद लेता था, वही परिवार आज लगभग ₹800-1000 या उससे अधिक खर्च कर रहा है। दाल, सब्जी, गैस और अन्य खाद्य वस्तुओं की महंगाई के साथ मिलकर यह खर्च मध्यम वर्ग और निम्न आय वर्ग के लिए बड़ा आर्थिक दबाव बन गया है।

राशन योजना से पेट भर रहा, लेकिन रसोई का खर्च बढ़ा

कोरोना काल में शुरू हुई मुफ्त राशन योजना से करोड़ों लोगों को अनाज मिला, लेकिन खाने का तेल, दाल, मसाले और अन्य आवश्यक वस्तुएं बाजार से ही खरीदनी पड़ती हैं। ऐसे में कई परिवारों का कहना है कि मुफ्त अनाज मिलने के बावजूद रसोई का कुल खर्च कम नहीं हुआ, क्योंकि तेल जैसी आवश्यक वस्तुएं लगातार महंगी बनी हुई हैं।

आगे क्या?

सरकार घरेलू तिलहन उत्पादन बढ़ाने के लिए नेशनल मिशन ऑन एडिबल ऑयल्स जैसी योजनाओं पर काम कर रही है, ताकि आयात पर निर्भरता घटे। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक भारत खाद्य तेल के आयात पर इतना निर्भर रहेगा, तब तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतार-चढ़ाव का असर भारतीय उपभोक्ताओं पर पड़ता रहेगा।

निष्कर्ष:
2014 से 2026 के बीच खाने के तेल की कीमतों में आई तेज वृद्धि ने भारतीय रसोई का बजट पूरी तरह बदल दिया है। महंगाई की सबसे बड़ी चोट उसी वस्तु पर पड़ी है, जिसका उपयोग हर घर में रोज होता है। मध्यम वर्ग की थाली से लेकर गरीब परिवार की रसोई तक, खाने के तेल की बढ़ती कीमतें आज भी सबसे बड़ी आर्थिक चुनौती बनी हुई हैं।

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Author: Dhaara News

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