पंचायत के बाद अब मत्स्य विभाग की भूमिका भी सवालों के घेरे में, विभाग ने न्यायालयीन प्रकरण का हवाला देकर साधी चुप्पी; जांच और जवाबदेही अब भी अधूरी
दुर्ग। ग्राम पंचायत चिंगरी के पांच तालाबों के कथित नियम विरुद्ध मत्स्य पट्टा आवंटन का मामला अब न्यायालयीन कार्रवाई तक पहुंच गया है। मामले में एसडीएम सोनल डेविड ने छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम 1993 के प्रावधानों के तहत प्रकरण दर्ज करने की कार्रवाई की है। जिला पंचायत दुर्ग की जांच रिपोर्ट के आधार पर तत्कालीन सरपंच चंद्रभान बंजारे के विरुद्ध प्रकरण पंजीबद्ध कर उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी करने और जवाब प्राप्त करने के निर्देश दिए गए हैं। मामले में अगली सुनवाई 20 नवंबर 2026 निर्धारित की गई है।
न्यायालयीन रिकार्ड में उल्लेख किया गया है कि जनपद पंचायत स्तर पर हुई जांच में ग्राम पंचायत चिंगरी के सभी पांच तालाबों को शासन के स्पष्ट आदेश के बिना एक मछुआ समूह को सात वर्षों के लिए आवंटित किए जाने और नियमों के विपरीत मनमाने तरीके से लीज पट्टा जारी किए जाने की बात सामने आई है। इसे छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम 1993 के प्रावधानों के विपरीत माना गया है। इसी आधार पर तत्कालीन सरपंच चंद्रभान बंजारे के विरुद्ध कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू की गई है।
न्यायालय पहुंचा मामला, लेकिन मत्स्य विभाग की भूमिका पर अब भी सवाल
इस पूरे मामले में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि 19 फरवरी 2026 को उप संचालक मत्स्य पालन, दुर्ग ने कलेक्टर को लिखे पत्र में स्पष्ट किया था कि तालाबों के लीज आवंटन की कार्यवाही मत्स्य विभाग द्वारा नहीं की गई थी। वहीं अब विभाग की ओर से विधिक कारणों और न्यायालयीन प्रकरण का हवाला दिए जाने की बात सामने आ रही है।
लेकिन सवाल यह है कि वर्ष 2018 से 2025 तक पांचों तालाबों में लगातार मत्स्य पालन होता रहा, तो विभागीय अधिकारियों ने इसकी निगरानी और जांच क्यों नहीं की? क्या विभाग ने कभी तालाबों का भौतिक सत्यापन किया? सात वर्षों में कितना मछली उत्पादन हुआ और कितनी आय अर्जित की गई? पंचायत को कितनी लीज राशि प्राप्त हुई और संभावित आर्थिक नुकसान कितना हुआ?
इन सवालों पर अब तक कोई ठोस जांच रिपोर्ट या सार्वजनिक रूप से स्पष्ट जवाब सामने नहीं आया है।
क्या सिर्फ पंचायत के तत्कालीन पदाधिकारी ही जिम्मेदार हैं?
न्यायालयीन कार्रवाई शुरू होने के बाद अब यह सवाल और महत्वपूर्ण हो गया है कि यदि तालाबों का आवंटन नियम विरुद्ध था, तो इसकी जानकारी संबंधित विभाग को क्यों नहीं हुई? आखिर सात वर्षों तक मत्स्य पालन की गतिविधियां कैसे संचालित होती रहीं? क्या संबंधित विभाग के अधिकारियों ने अपने दायित्वों का निर्वहन किया था?
मामले में केवल पट्टा जारी करने वाले पंचायत पदाधिकारियों की जवाबदेही तय करना पर्याप्त नहीं होगा। संबंधित मत्स्य विभाग के अधिकारियों की भूमिका, निगरानी व्यवस्था और विभागीय पत्राचार की भी निष्पक्ष जांच जरूरी है।
अब पांच तालाबों की आय और नुकसान का हिसाब कब?
इस प्रकरण में अब सबसे बड़ी मांग पांचों तालाबों की वर्ष 2018 से 2025 तक की अवधि की विस्तृत जांच कराने की है। इसमें वास्तविक मत्स्य उत्पादन, अर्जित आय, निर्धारित लीज दर, पंचायत को मिलने वाली राशि और संभावित राजस्व नुकसान का आकलन किया जाना चाहिए। साथ ही यदि किसी स्तर पर नियमों की अनदेखी या लापरवाही हुई है, तो संबंधित जिम्मेदारों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
चिंगरी मत्स्य पट्टा मामला अब केवल पंचायत स्तर की अनियमितता तक सीमित नहीं रह गया है। न्यायालय में प्रकरण दर्ज होने के बाद कार्रवाई की शुरुआत जरूर हुई है, लेकिन असली सवाल अभी भी बरकरार है—सात वर्षों तक चले कथित नियम विरुद्ध मत्स्य पालन की पूरी जिम्मेदारी कौन लेगा और पंचायत को हुए संभावित आर्थिक नुकसान की भरपाई कब होगी?
(जल्द ही PART-8 में पढ़िए: तालाबों से सात वर्षों में कितनी अवैध कमाई और पंचायत को कितना हुआ संभावित नुकसान? मत्स्य विभाग की जवाबदेही पर आगे की पड़ताल।)








