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चर्चा में: Congress के बड़े नेता आखिर खामोश क्यों? दुर्ग में पंचायतों में राशि वितरण का विवाद गहराया, विपक्षी सदस्यों की आवाज उठाने वाला कोई नहीं

दुर्ग। जनपद पंचायत दुर्ग और जिला पंचायत में विकास निधि के कथित असमान वितरण को लेकर उठे सवाल अब केवल पंचायत स्तर का विवाद नहीं रह गए हैं। निर्वाचित सदस्यों की आपत्तियां, राशि वितरण में कथित भेदभाव और इस पूरे मामले को लेकर सामने आई शिकायतों ने राजनीतिक बहस को भी तेज कर दिया है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल अब कांग्रेस के उन बड़े नेताओं की भूमिका को लेकर उठ रहा है, जिनका प्रभाव दुर्ग जिले की राजनीति में लंबे समय से रहा है।

पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, पूर्व गृह मंत्री ताम्रध्वज साहू, पूर्व कृषि मंत्री रविंद्र चौबे और पूर्व मंत्री गुरु रुद्र कुमार जैसे वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं की ओर से इस मुद्दे पर अब तक कोई प्रमुख राजनीतिक हस्तक्षेप दिखाई नहीं देने को लेकर कांग्रेस के ही निर्वाचित जनप्रतिनिधियों और कार्यकर्ताओं के बीच चर्चा शुरू हो गई है।

जब अपने ही जनप्रतिनिधि आवाज उठाएं तो बड़े नेता कहां हैं?

जिला पंचायत और जनपद पंचायत में निर्वाचित सदस्य जनता के बीच से चुनकर आते हैं। उनके पास अपने क्षेत्र में विकास कार्य कराने और जनता के सामने जवाब देने की जिम्मेदारी होती है। ऐसे में यदि किसी सदस्य का आरोप है कि विकास राशि के वितरण में उसके साथ भेदभाव हुआ है, तो उसका राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर समाधान कराने की जिम्मेदारी संबंधित दल के वरिष्ठ नेताओं की भी बनती है।

लेकिन मौजूदा स्थिति में सवाल यही है कि जब कांग्रेस के निर्वाचित सदस्य अपनी समस्या लेकर खड़े हैं, तो उनकी आवाज को प्रदेश और जिले के बड़े नेता आगे क्यों नहीं बढ़ा रहे?

क्षेत्र में काम नहीं होगा तो जनता के बीच क्या जवाब देंगे सदस्य?

पंचायत प्रतिनिधियों की सबसे बड़ी चिंता यही है कि उन्हें जनता के बीच जाकर अपने कार्यकाल का हिसाब देना है। यदि विकास कार्यों के लिए पर्याप्त राशि नहीं मिलती या राशि वितरण को लेकर असमानता के आरोप लगातार सामने आते हैं, तो इसका सीधा असर निर्वाचित प्रतिनिधियों की राजनीतिक साख पर पड़ सकता है।

जनता यह नहीं देखती कि राशि आवंटन का फैसला किस स्तर पर हुआ। जनता अपने क्षेत्र के प्रतिनिधि से ही सवाल करती है—काम क्यों नहीं हुआ? सड़क क्यों नहीं बनी? नाली, भवन, पानी और अन्य विकास कार्य क्यों अटके हैं?

ऐसे में कांग्रेस के विपक्षी सदस्य यदि स्वयं को असहाय महसूस कर रहे हैं, तो आने वाले चुनावी समय में इसका राजनीतिक नुकसान कांग्रेस को उठाना पड़ सकता है।

सिर्फ बयान नहीं, अब राजनीतिक हस्तक्षेप की जरूरत

इस पूरे मामले में कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं से यह अपेक्षा की जा रही है कि वे निर्वाचित सदस्यों के साथ खड़े हों। यदि राशि वितरण में वास्तव में भेदभाव हुआ है तो दस्तावेज सामने रखकर प्रशासन के समक्ष आपत्ति दर्ज कराने से लेकर आंदोलन तक की रणनीति बनाई जा सकती है।

सवाल यह भी है कि कांग्रेस अपने निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के अधिकारों के लिए सड़क पर कब उतरेगी?

दुर्ग जिले में कांग्रेस पहले से ही राजनीतिक चुनौतियों का सामना कर रही है। ऐसे में यदि उसके ही पंचायत प्रतिनिधि अपने क्षेत्र में विकास कार्यों के लिए संघर्ष करते नजर आए और पार्टी के बड़े नेता उनसे दूरी बनाए रखें, तो इसका असर संगठन की जमीनी पकड़ पर पड़ना स्वाभाविक है।

अब निगाह बड़े नेताओं पर

जनपद पंचायत और जिला पंचायत के राशि वितरण को लेकर उठे विवाद का प्रशासनिक समाधान क्या होगा, यह आने वाला समय बताएगा। लेकिन कांग्रेस के लिए राजनीतिक सवाल इससे बड़ा है—क्या वह अपने निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की लड़ाई को अपनी लड़ाई बनाएगी या फिर पंचायत स्तर के इस विवाद को केवल सदस्यों के भरोसे छोड़ देगी?

क्योंकि पंचायत के सदस्य यदि जनता के बीच जाकर अपने विकास कार्यों का हिसाब नहीं दे पाए, तो इसका असर केवल उनके राजनीतिक भविष्य पर नहीं, बल्कि दुर्ग जिले में कांग्रेस की जमीनी राजनीति पर भी पड़ सकता है।

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Author: Dhaara News

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