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Part 3: दुर्ग ग्रामीण मत्स्य घोटाला: विभाग की जांच में खुलासे पर खुलासा, 9 महीने पहले बताया निस्तार फर्जी बाद में उप संचालक ने कहा लीज अवैध, फिर भी जिम्मेदारों पर कार्रवाई नहीं!!

 

दुर्ग। ग्राम पंचायत चिंगरी के तालाब लीज प्रकरण में अब नए दस्तावेज सामने आने के बाद मामला और गंभीर हो गया है। एक ओर 15 मई 2025 की विभागीय जांच रिपोर्ट में संबंधित निस्तार प्रमाण-पत्र को नियमों के अनुरूप नहीं माना गया, वहीं दूसरी ओर 19 फरवरी 2026 को कलेक्टर दुर्ग को भेजे गए उप संचालक मत्स्य पालन के प्रतिवेदन में यह स्वीकार किया गया कि ग्राम चिंगरी के तालाबों का लीज आवंटन मत्स्य पालन विभाग द्वारा किया ही नहीं गया था। इसके बावजूद आज तक किसी अधिकारी, पंचायत प्रतिनिधि या अन्य जिम्मेदार व्यक्ति की जवाबदेही तय नहीं हो सकी है।

विभाग के दो प्रतिवेदन, कई सवाल

15 मई 2025 को सहायक मत्स्य अधिकारी द्वारा की गई जांच में पाया गया था कि जिस “बंधा तालाब” को निस्तार हेतु सुरक्षित बताया गया था, वहां निस्तार संबंधी आवश्यक व्यवस्थाएं मौजूद नहीं थीं। जांच में यह भी सामने आया कि ग्राम पंचायत के पुराने प्रस्तावों में “नया तालाब” को निस्तार हेतु छोड़ने की चर्चा थी, जबकि “बंधा तालाब” को सुरक्षित रखने का निर्णय दर्ज था।

इसके बाद 19 फरवरी 2026 को उप संचालक मत्स्य पालन, दुर्ग द्वारा कलेक्टर को भेजे गए प्रतिवेदन में एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया। विभाग ने स्पष्ट लिखा कि “मत्स्य पालन विभाग द्वारा ग्राम चिंगरी अधीनस्थ तालाबों के लीज आवंटन की कार्यवाही नहीं की गई थी।”

यानी जिस लीज को लेकर वर्षों से विवाद चल रहा है, उसके संबंध में स्वयं विभाग कह रहा है कि उसने कोई लीज आवंटित ही नहीं की।

फिर पट्टा किसने और कैसे दिया?

अब सबसे बड़ा प्रश्न यह खड़ा हो गया है कि यदि मत्स्य पालन विभाग ने लीज आवंटन नहीं किया, तो संबंधित समिति को तालाब पर अधिकार किस आधार पर मिला? यदि विभागीय अनुमति नहीं थी तो पंचायत स्तर पर जारी किए गए दस्तावेजों और पट्टा प्रक्रिया की वैधता क्या थी?

स्थानीय लोगों का कहना है कि यही वह बिंदु है, जहां पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच आवश्यक हो जाती है।

जांच हुई, लेकिन जिम्मेदार कौन?

मामले में शिकायतकर्ता द्वारा लगातार आरोप लगाए जा रहे हैं कि—

1. निस्तार संबंधी दस्तावेजों में गंभीर अनियमितताएं थीं।

2. न्यायालय में विवाद लंबित रहने के दौरान प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई।

3. विभागीय जांच में कई तथ्य सामने आए।

4. विभाग स्वयं लीज आवंटन से इनकार कर रहा है।

5. मत्स्य निरीक्षक ने जांच के दौरान क्यों छुपाया की लीज अवैध है

इसके बावजूद न तो किसी अधिकारी की जिम्मेदारी तय हुई और न ही किसी प्रकार की दंडात्मक कार्रवाई की सूचना सार्वजनिक हुई है।

राजस्व और जवाबदेही का भी सवाल

शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यदि लीज प्रक्रिया वैधानिक नहीं थी, तो वर्षों तक हुए मत्स्य पालन से प्राप्त आय, पंचायत को संभावित राजस्व हानि और संबंधित दस्तावेजों की वैधता की भी जांच होनी चाहिए। साथ ही संबंधित समिति के वित्तीय लेन-देन और ऑडिट की स्थिति भी स्पष्ट की जानी चाहिए।

प्रशासनिक चुप्पी पर उठ रहे सवाल

लगातार सामने आ रहे दस्तावेजों के बाद ग्रामीण क्षेत्र में यह चर्चा तेज हो गई है कि जब विभागीय रिकॉर्ड में ही विरोधाभास दिखाई दे रहे हैं, तब अब तक किसी के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई। लोगों का कहना है कि यदि जांच रिपोर्टों के निष्कर्षों पर भी कार्रवाई नहीं होती, तो इससे प्रशासनिक जवाबदेही पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। शिकायत कर्ताओं का यह भी कहना है कि 15.05.2025 को जांच में निस्तार फर्जी है प्रमाणित हुआ लेकिन लीज फर्जी है यह नहीं बताया गया। जबकि ठीक 9 महीने बाद मछली पालन विभाग ने यह बता दिया कि उन्होंने लीज ही नहीं किया है ऐसा क्यों?

अब आगे क्या?

शिकायतकर्ता पक्ष ने संकेत दिया है कि यदि मामले में दोषियों की जिम्मेदारी तय नहीं की गई और वैधानिक कार्रवाई नहीं हुई, तो वे उच्च न्यायालय सहित अन्य सक्षम संस्थाओं का दरवाजा खटखटाएंगे।

चिंगरी का यह प्रकरण अब केवल एक तालाब लीज विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह सवाल बन गया है कि जब विभाग स्वयं कह रहा है कि उसने लीज आवंटन नहीं किया, तब उस कथित लीज की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? और यदि जांच में अनियमितताएं सामने आ चुकी हैं, तो कार्रवाई कब होगी?

(समाचार उपलब्ध विभागीय पत्राचार, जांच प्रतिवेदन एवं शिकायतकर्ताओं द्वारा उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों पर आधारित है। अंतिम निष्कर्ष एवं दायित्व निर्धारण सक्षम प्राधिकारी एवं न्यायालय के अधीन है।)

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Author: Dhaara News

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