7 महीने से जांच का बहाना… खुद माना “लीज हमने नहीं दी”, फिर भी न वसूली, न एफआईआर, न मौके पर जांच
दुर्ग, 04 अगस्त 2026। ग्राम पंचायत चिंगरी के पांच तालाबों में वर्ष 2018 से 2025 तक कथित रूप से हुए अवैध मत्स्य पालन मामले में मछली पालन विभाग की कार्यप्रणाली अब गंभीर सवालों के घेरे में है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि विभाग ने कार्रवाई करने के बजाय अपने “हाथ-पैर बांध लिए हैं और आंख-कान मूंद लिए हैं”, जिससे पूरे मामले में भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने की आशंका पैदा हो रही है।
12 जनवरी 2026 को कलेक्टर जनदर्शन में शिकायत दर्ज होने के बाद सात महीने से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन न किसी प्रकार की वास्तविक वसूली हुई, न मौके पर वैधानिक जांच कराई गई और न ही जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध कोई प्रभावी कार्रवाई सामने आई।
विभाग ने स्वयं लिखा—लीज हमने नहीं दी
19 फरवरी 2026 को उप संचालक, मछली पालन विभाग, दुर्ग द्वारा कलेक्टर को भेजे गए पत्र में स्पष्ट उल्लेख किया गया कि ग्राम चिंगरी के तालाबों का लीज आबंटन विभाग द्वारा नहीं किया गया था।

यानी विभाग स्वयं यह स्वीकार कर चुका है कि पट्टा उसकी ओर से जारी नहीं हुआ, फिर भी कथित अवैध मत्स्य पालन से हुए लाभ की गणना, वास्तविक लीज राशि का निर्धारण और शासन को हुई आर्थिक क्षति का आकलन आज तक नहीं किया गया।
*जब रिकॉर्ड सामने हैं, फिर किस बात की प्रतीक्षा?*
16 फरवरी 2026 की जनपद पंचायत जांच रिपोर्ट में तत्कालीन सरपंच एवं सचिव द्वारा नियम-विरुद्ध पट्टा जारी किए जाने का उल्लेख है।
इसके बाद 30 जुलाई 2026 को ग्राम पंचायत चिंगरी ने भी पत्र जारी कर स्वीकार किया कि 29 सितंबर 2018 को जारी पट्टा नियमों के अनुरूप नहीं था तथा शासन को आर्थिक क्षति हुई।

इसके बावजूद विभाग का जवाब यही है कि ग्राम पंचायत से जानकारी मिलने के बाद आगे कार्रवाई की जाएगी।
*अब बड़ा सवाल यह है कि—*
जब जांच रिपोर्ट उपलब्ध है,
ग्राम पंचायत स्वयं पत्र दे चुकी है,
और विभाग यह मान चुका है कि लीज उसने जारी नहीं की,
तो फिर कार्रवाई किस दस्तावेज के इंतजार में रुकी हुई है?
क्या करोड़ों के संभावित अवैध लाभ की जांच होगी?
शिकायतकर्ता का कहना है कि लगभग 9 हेक्टेयर क्षेत्र में सात वर्षों तक मत्स्य पालन हुआ।
यदि विभाग मौके पर जाकर वास्तविक उत्पादन, बाजार मूल्य, वैध लीज दर तथा पंचायत को हुई राजस्व हानि का आकलन करे तो शासन को हुए नुकसान और कथित अवैध लाभ की वास्तविक राशि सामने आ सकती है।
*अब तक विभाग ने यह भी सार्वजनिक नहीं किया है कि—*
प्रति हेक्टेयर वैध लीज राशि कितनी होनी चाहिए थी,
पंचायत को कुल कितना राजस्व नुकसान हुआ,
और कथित अवैध लाभार्थियों से कितनी राशि वसूली जानी चाहिए।
क्योंकि शिकायतकर्ता का दावा है कि मछली पालन विभाग द्वारा स्वयं 2018 में लीज के बाद तत्कालीन मत्स्य निरीक्षक अजीत गुप्ता तत्कालीन सरपंच चंद्रभान बंजारे कुलेश्वर साहू तत्कालीन सचिव और संबंधित मछुआ समूह के अध्यक्ष को संयुक्त रूप से नोटिस जारी किया था और जवाब मांगा गया था अर्थात अवैध लीज के बारे में सबको पता था।
*जनता पूछ रही है*
यदि विभाग स्वयं मान रहा है कि लीज उसके द्वारा जारी नहीं हुई थी, और अन्य विभागों की जांच रिपोर्ट भी उपलब्ध है, तो फिर—
मौके पर जांच क्यों नहीं?
आर्थिक क्षति का आकलन क्यों नहीं?
वसूली की कार्रवाई क्यों नहीं?
जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई क्यों नहीं?
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि मछली पालन विभाग की निष्क्रियता से पूरे मामले में भ्रष्टाचार को संरक्षण मिलने की आशंका उत्पन्न हो रही है।
अब निगाहें जिला प्रशासन और राज्य स्तर के अधिकारियों पर हैं कि क्या इस मामले में निष्पक्ष जांच कर शासन को हुए नुकसान की भरपाई कराई जाएगी या यह मामला भी केवल पत्राचार तक सीमित रह जाएगी।








